Saturday, 9 June 2012
स्वयं का परिष्कार
जीवन में जितनी भी समस्याएं हैं, उनके मूल में हमारे अपने गलत विचार और बुरे कर्म होते हैं। गलत कामों से निकलने के लिए हमें अपना परिष्कार करना पडेगा। इसी को प्रायश्चित कहते हैं..
पाप कर्म (बुरे काम) इसलिए बढते रहते हैं, क्योंकि करने वाला उनसे होने वाली हानियों पर ध्यान नहीं देता। वह उन्हें अन्य लोगों द्वारा भी अपनाई जाने वाली सामान्य प्रक्रिया मान लेता है और हल्के मन से करता चला जाता है। बाद में यह अभ्यास बन जाता है। धन और अधिकार जैसे लाभ मिलने से यह आकर्षण और भी बढ जाता है। यह आदत स्वभाव का अंग बन जाती है, जो समझाने-बुझाने से भी नहीं छूटती।
इस कुमार्ग से विरत होने का एक ही मार्ग है कि चलने वाले को उस मार्ग की हानियां दिखाई दें। उसे पता हो कि वह अपना और दूसरों का कितना अहित कर चुका है और आगे न जाने कितनी हानि हो सकती है। यह पता चलने के बाद ही हम अपना परिष्कार कर पाएंगे।
बुरे कामों, गलत प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं से दूसरों का अहित और अपना हित सधने की बात कही जाती है, पर वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। कुमार्ग की कंटीली राह पर चलने से अपने ही पैर कांटों से बिंधते हैं। झाडियों को भी हानि होती है। लेकिन घाटे में तो अपने को ही रहना पडा। मस्तिष्क विकृत होने से प्रगति के रचनात्मक कार्र्यो में लग सकने वाली शक्ति नष्ट हो जाती है। यह बहुमूल्य यंत्र (शरीर) विकृत हो जाता है। शारीरिक-मानसिक रोगों की बाढ आ जाती है। अत: बुद्धिमत्ता इसी में है कि अच्छी प्रवृत्ति को अपनाया जाए और अंत:करण को सद्भावनाओं से भरा-पूरा रखा जाए। इस परिष्कार की उपयोगिता इसी दृष्टि से है कि अंत:करण में अनाचार विरोधी प्रतिक्रिया इतने उग्र रूप में उभरे कि भविष्य में उस प्रकार के अनाचरण की गुंजाइश ही न रहे।
अनैतिक दुराव के कारण मन की भीतरी परतों में विशेष प्रकार की मनोवैज्ञानिक ग्रंथियां बनती हैं। उनके कारण शारीरिक-मानसिक रोग उठ खडे होते हैं। यह प्रकृति द्वारा बनाई स्वसंचालित दंड व्यवस्था है। इसमें अपना तन-मन न्यायाधीश बनकर अनाचार के दुष्परिणाम प्रस्तुत करता रहता है। शरीर में विष का प्रवेश हो जाए, तो उसे निकाल बाहर करना ही प्राण रक्षा का एकमात्र उपाय है। ठीक उसी प्रकार अनैतिक दुराव की ग्रंथियों को निकाल बाहर करने से ही वह मन:स्थिति प्राप्त होती है, जो सुविकसित जीवन-क्रम बनाने के लिए आवश्यक होती है। इसलिए अनैतिक कृत्यों को किसी के सामने स्वीकारना आवश्यक है।
एक और तरीका है-अपने ऊपर ऐसे दबाव डालना, जिनकी स्मृति देर तक बनी रहे। बच्चे को कभी अधिक गडबडी करने पर अभिभावक हलकी-सी चपत जड देते हैं या दूसरे प्रकार से धमका देते हैं, इससे बच्चे पर सामान्य समझाने-बुझाने की अपेक्षा अधिक असर पडता है। यह थोडा कष्टकर होने पर भी परिणाम की दृष्टि से अच्छा होता है। प्रायश्चित रूप में अपने आपको दंड देने की यह पद्धति "तप-तितीक्षा" के नाम से बनाई गई है। अंतिम चरण क्षतिपूर्ति का है, जो सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें जो हानि पहुंचाई गई है, उसकी पूर्ति होनी चाहिए। सडक पर गड्ढा खोदकर यदि दूसरों को गिराने का आचरण किया गया है, तो जितना श्रम गड्ढा खोदने में किया है, उतना ही उसे भरने में करना होगा। पाप के बराबर पुण्य करना होगा।
युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्यजी
ஜ۩۞۩ஜ हरि ॐ तत्सत् ஜ۩۞۩ஜ
Tuesday, 5 June 2012
कुछ सरल अभ्यासों से कमर को बनाएं लचकदार
यदि आपकी कमर और पेट लचकदार तथा संतुलित हैं तो स्फूर्ति और जोश तो कायम रहेगा ही साथ ही आप कई तरह के रोग से बच जाएंगे | अनियमित और अत्यधिक खान-पान के कारण कमर के कमरा बनने में देर नहीं लगती | कमर के छरहरा होने से व्यक्ति फिट नजर तो आता ही है साथ ही उसमें फूर्ति भी बनी रहती है | कमर को छरहरा बनाए रखने के लिए यहाँ प्रस्तुत है कुछ योग अभ्यास|
* स्टेप 1- कटि चक्रासन करें| सावधान मुद्रा में खड़े हो जाएँ | फिर दोनों हाथों को कमर पर रखकर कमर से पीछे की ओर जहाँ तक संभव हो झुककर वहाँ रुकें | अब साँस की गति सामान्य रखकर आँखें बंद कर लें और कुछ देर इसी पोजिशन में रुकने के बाद वापस आ जाएँ | 4-5 बार दोनों ओर से इसका अभ्यास कर लें |
* स्टेप 2- इसके बाद पुन: सावधान मुद्रा में खड़े होकर दाएँ हाथ को बाएँ कंधे पर और बाएँ हाथ को दाएँ कंधे पर रखकर पहले दाईं ओर कमर से पीछे की ओर मुड़ें | गर्दन को भी मोड़कर पीछे की ओर देखें | अब साँस की गति सामान्य रखकर आँखें बंद कर लें और कुछ देर इसी पोजिशन में रुकने के बाद वापस आ जाएँ | 4-5 बार दोनों ओर से इसका अभ्यास कर लें |
* स्टेप 3- सावधान मुद्रा में खड़े होकर फिर हथेलियों को पलटकर हाथों को ऊपर उठाकर समानांतर क्रम में सीधा कर लें | साँस लेते हुए कमर को बाईं ओर झुकाएँ | इसमें हाथ भी साथ-साथ बाईं ओर चले जाएँगे | अधिक से अधिक कमर झुकाकर वहाँ रुकें | अब साँस की गति सामान्य रखकर आँखें बंद कर लें और कुछ देर इसी पोजिशन में रुकने के बाद वापस आ जाएँ | 4-5 बार दोनों ओर से इसका अभ्यास कर लें |
* स्टेप 4- शवासन में लेटकर पहले दोनों हाथ समानांतर क्रम में फैला लें | फिर दाएँ पैर को बाईं ओर ले जाएँ और गर्दन को मोड़कर दाईं ओर देखें | इस दौरान बायाँ पैर सीधा ही रखें | फिर इसी क्रम में इसका विपरित करें | 4-5 बार दोनों ओर से इसका अभ्यास कर लें |
* इसके लाभ : यह योग अभ्यास कमर की चर्बी को कम करते है। इसके अलावा यह कब्ज व गैस की प्रॉब्लम दूर करके किडनी, लीवर, आँतों व पैन्क्रियाज को भी स्वस्थ बनाए रखने में सक्षम हैं।
* योग पैकेज : उक्त स्टेप के अलावा आप चाहें तो वृक्षासन, ताड़ासन, त्रिकोणासन, पादस्तासन, आंजनेय आसन और विरभद्रासन भी कर सकते हैं, लेकिन किसी योग शिक्षक की सलाह अनुसार इसके क्रम और विलोम आसन को समझते हुए |
(यह प्रयास श्रीगुरुचरणों में समर्पित, जो स्वयं ही इसका आधार हैं)
अभिनव वशिष्ठ.
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Monday, 4 June 2012
खण्डग्रास चंद्रग्रहण : 04-06-12
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ज्येष्ठ शुक्ल पू्र्णिमा सोमवार, दिनाँक 4 जून 2012 ई. को ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी-दक्षिणी अमेरिका, पूर्वी एशिया तथा पेसिफिक महासागर में भारतीय समयानुसार दोपहर बाद 3:30 से सायंकाल 5:36 बजे के मध्य खण्डग्रास चंद्रग्रहण दिखाई देगा | इस दिन भा.स्टै.टा. अनुसार 6:50 तक चन्द्रमा पृथ्वी की विरल छाया में रहेगा, अत: भारत के पूर्वी राज्यों में जहाँ चंद्रोदय सायंकाल 6:50 बजे से पहले होगा, वहाँ चन्द्रमा कुछ धुन्धला अवश्य दिखाई देगा, परन्तु इसे ग्रहण की श्रेणी में नही माना जा सकता | अत: ग्रहण के सूतकादि भारत में माने जाने की आवश्यकता नहीं है |
योगासन : क्या हैं? और कहाँ से आए?
योगासन : क्या हैं? और कहाँ से आए?
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चित्त को स्थिर रखने वाले तथा सुख देने वाले बैठने के प्रकार को आसन कहते हैं | आसन अनेक प्रकार के माने गए हैं | योग में यम और नियम के बाद आसन का तीसरा स्थान है |
* आसन का उद्येश्य : आसनों का मुख्य उद्देश्य शरीर के मल का नाश करना है | शरीर से मल या दूषित विकारों के नष्ट हो जाने से शरीर व मन में स्थिरता का अविर्भाव होता है | शांति और स्वास्थ्य लाभ मिलता है | अत: शरीर के स्वस्थ रहने पर मन और आत्मा में संतोष मिलता है |
* आसन और व्यायाम : आसन एक वैज्ञानिक पद्धति है | आसन और अन्य तरह के व्यायामों में फर्क है | आसन जहाँ हमारे शरीर की प्रकृति को बनाए रखते हैं वहीं अन्य तरह के व्यायाम इसे बिगाड़ देते हैं |
'आसनानि समस्तानियावन्तों जीवजन्तव:। चतुरशीत लक्षणिशिवेनाभिहितानी च।'- अर्थात संसार के समस्त जीव जन्तुओं के बराबर ही आसनों की संख्या बताई गई है, यानी कि 84 लाख योनियों से 84 लाख प्रकार के आसन |
इस तरह हुआ आसनों का आविष्कार:-
1.पशु-पक्षी आसन : पहले प्रकार के वे आसन जो पशु-पक्षियों के उठने-बैठने, चलने-फिरने या उनकी आकृति के आधार पर बनाए गए हैं जैसे- वृश्चिक, भुंग, मयूर, शलभ, मत्स्य, गरुढ़, सिंह, बक, कुक्कुट, मकर, हंस, काक, मार्जार आदि |
2.वस्तु आसन : दूसरी तरह के आसन जो विशेष वस्तुओं के अंतर्गत आते हैं जैसे- हल, धनुष, चक्र, वज्र, शिला, नौका आदि |
3.प्रकृति आसन : तीसरी तरह के आसन वनस्पति और वृक्षों आदि पर आधारित हैं जैसे- वृक्षासन, पद्मासन, लतासन, ताड़ासन, पर्वतासन आदि |
4.अंग आसन : चौथी तरह के आसन विशेष अंगों को पुष्ट करने वाले तथा अंगों के नाम से संबंधित होते हैं- जैसे शीर्षासन, एकपाद ग्रीवासन, हस्तपादासन, सर्वांगासन, कंधरासन, कटि चक्रासन, पादांगुष्ठासन आदि |
5.योगी आसन : पांचवीं तरह के वे आसन हैं जो किसी योगी या भगवान के नाम पर आधारित हैं- जैसे महावीरासन, ध्रुवासन, मत्स्येंद्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन, हनुमानासन, भैरवासन आदि |
6.अन्य आसन : इसके अलावा कुछ आसन ऐसे हैं- जैसे चंद्रासन, सूर्यनमस्कार, कल्याण आसन आदि | इन्हें अन्य आसनों के अंतर्गत रखा गया है |
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* आसन के मुख्य प्रकार :
1.बैठकर किए जाने वाले आसन,
2.पीठ के बाल लेटकर किए जाने वाले आसन,
3.पेट के बाल लेटकर किए जाने वाले आसन और
4.खड़े होकर किए जाने वाले आसन |
उक्त चार प्रकार के आसनों में से कुछ आसन ऐसे हैं जिन्हें बैठकर, लेटकर और खड़े रहकर तीनों ही तरीके से किया जाता है | इनमें से कुछ आसन ऐसे भी हैं जिन्हें हाथ के पंजों के बल या पैर के घुटनों के बल पर किया जाता है |
1.बैठकर : पद्मासन, वज्रासन, सिद्धासन, मत्स्यासन, वक्रासन, अर्ध-मत्स्येन्द्रासन, पूर्ण मत्स्येन्द्रासन, गोमुखासन, पश्चिमोत्तनासन, ब्राह्म मुद्रा, उष्ट्रासन, योगमुद्रा, उत्थीत पद्म आसन, पाद प्रसारन आसन, द्विहस्त उत्थीत आसन, बकासन, कुर्म आसन, पाद ग्रीवा पश्चिमोत्तनासन, बध्दपद्मासन, सिंहासन, ध्रुवासन, जानुशिरासन, आकर्णधनुष्टंकारासन, बालासन, गोरक्षासन, पशुविश्रामासन, ब्रह्मचर्यासन, उल्लुक आसन, कुक्कुटासन, उत्तान कुक्कुटासन, चातक आसन, पर्वतासन, काक आसन, वातायनासन, पृष्ठ व्यायाम आसन-1, भैरवआसन, भरद्वाजआसन, बुद्धपद्मासन, कूर्मासन, भूनमनासन, शशकासन, गर्भासन, मंडूकासन, सुप्त गर्भासन, योगमुद्रासन आदि |
2.पीठ के बल लेटकर : अर्धहलासन, हलासन, सर्वांगासन, विपरीतकर्णी आसन, पवनमुक्तासन, नौकासन, दीर्घ नौकासन, शवासन, पूर्ण सुप्त वज्रासन, सेतुबंध आसन, तोलांगुलासन, प्राणमुक्त आसन, कर्ण पीड़ासन, उत्तानपादासन, चक्रासन, कंधरासन, स्कन्धपादासन, मर्कटासन, ग्रीवासन, एकपादग्रीवासन, द्विपादग्रीवासन, कटी व्यायाम आसन, पृष्ठ व्यायाम आसन-2 आदि |
3.पेट के बल लेटकर : मकरासन, धनुरासन, भुजंगासन, शलभासन, विपरीत नौकासन, खग आसन, चतुरंग दंडासन, कोनासन आदि |
4.खड़े होकर : ताड़ासन, वृक्षासन, अर्धचंद्रमासन, अर्धचक्रासन, दो भुज कटिचक्रासन, चक्रासन, पाद्पश्चिमोत्तनासन, गरुढ़ासन, चंद्रनमस्कार, चंद्रासन, उर्ध्व उत्थान आसन, पाद संतुलन आसन, मेरुदंड वक्का आसन, अष्टावक्र आसन, बैठक आसन, उत्थान बैठक आसन, अंजनेय आसन, त्रिकोणासन, नटराज आसन, एक पाद विराम आसन, एकपाद आकर्षण आसन, उत्कटासन, उत्तानासन, कटी उत्तानासन, जानु आसन, उत्थान जानु आसन, हस्तपादांगुष्ठासन, पादांगुष्ठासन, ऊर्ध्वताड़ासन, पादांगुष्ठानासास्पर्शासन, कल्याण आसन आदि |
5.अन्य : शीर्षासन, मयुरासन, सूर्य नमस्कार, वृश्चिकासन, चंद्र नमस्कार, लोलासन, अधोमुखश्वानासन, मोक्ष आसन, अदवासन, अग्नीस्तंभासन, अनंतासन, अंजनेयासन, योगनिद्रा, मार्जारासन, अनुवित्तासन, अश्व संचालन आसन, भुजपीड़ासन, बिदालासन, बंधासन, चक्र बंधासन, चक्र वज्रासन, चकोरआसन, द्रधासन, द्विपाद परिवर्त्ता कोंडियासन उपधानासन, द्विचक्रिकासन, पादवृत्तासन, पॄष्ठतानासन, प्रसृतहस्त शंखासन, पक्ष्यासन आदि |
* आसन करने के पूर्व : सूक्ष्म व्यायाम (अंग संचालन) के बाद ही योग के आसनों को किया जाता है | योग प्रारम्भ करने के पूर्व अंग-संचालन करना आवश्यक है | इससे अंगों की जकड़न समाप्त होती है तथा आसनों के लिए शरीर तैयार होता है |
* आसनों को सीखना प्रारम्भ करने से पूर्व कुछ आवश्यक सावधानियों पर ध्यान देना जरूरी है | आसन प्रभावकारी तथा लाभदायक तभी हो सकते हैं, जबकि उसको उचित रीति से किया जाए | आसनों को किसी योग्य योग चिकित्सक की देख-रेख में करें तो ज्यादा अच्छा होगा |
(यह प्रयास श्रीगुरुचरणों में समर्पित, जो स्वयं इसका आधार हैं)
अभिनव वशिष्ठ.
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ஜ۩۞۩ஜ हरि ॐ तत्सत् ஜ۩۞۩ஜ
Saturday, 2 June 2012
*** योगमार्ग में ऐसे जाना जा सकता है पूर्वजन्म को... ***
हमारा संपूर्ण जीवन स्मृति-विस्मृति के चक्र में फंसा रहता है। उम्र के साथ स्मृति का घटना शुरू होता है, जोकि एक प्राकृति प्रक्रिया है, अगले जन्म की तैयारी के लिए। यदि मोह-माया या राग-द्वेष ज्यादा है तो समझों स्मृतियां भी मजबूत हो सकती है। व्यक्ति स्मृति मुक्त होता है तभी प्रकृति उसे दूसरा गर्भ उपलब्ध कराती है। लेकिन पिछले जन्म की सभी स्मृतियां बीज रूप में कारण शरीर के चित्त में संग्रहित रहती है। विस्मृति या भूलना इसलिए जरूरी होता है कि यह जीवन के अनेक क्लेशों से मुक्त का उपाय है।
योग में अष्टसिद्धि के अलावा अन्य 40 प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है। उनमें से ही एक है पूर्वजन्म ज्ञान सिद्धि योग। इस योग की साधना करने से व्यक्ति को अपने अगले पिछले सारे जन्मों का ज्ञान होने लगता है। यह साधना कठिन जरूर है, लेकिन योगाभ्यासी के लिए सरल है।
* कैसे जाने पूर्व जन्म को : योग कहता है कि सर्व प्रथम चित्त को स्थिर करना आवश्यक है तभी इस चित्त में बीज रूप में संग्रहित पिछले जन्मों का ज्ञान हो सकेगा। चित्त में स्थित संस्कारों पर संयम करने से ही पूर्वन्म का ज्ञान होता है। चित्त को स्थिर करने के लिए सतत ध्यान क्रिया करना जरूरी है।
* जाति स्मरण का प्रयोग : जब चित्त स्थिर हो जाए अर्थात मन भटकना छोड़कर एकाग्र होकर श्वासों में ही स्थिर रहने लगे, तब जाति स्मरण का प्रयोग करना चाहिए। जाति स्मरण के प्रयोग के लिए ध्यान को जारी रखते हुए आप जब भी बिस्तर पर सोने जाएं तब आंखे बंद करके उल्टे क्रम में अपनी दिनचर्या के घटनाक्रम को याद करें। जैसे सोने से पूर्व आप क्या कर रहे थे, फिर उससे पूर्व क्या कर रहे थे तब इस तरह की स्मृतियों को सुबह उठने तक ले जाएं।
दिनचर्या का क्रम सतत जारी रखते हुए 'मेमोरी रिवर्स' को बढ़ाते जाए। ध्यान के साथ इस जाति स्मरण का अभ्यास जारी रखने से कुछ माह बाद जहां मोमोरी पॉवर बढ़ेगा, वहीं नए-नए अनुभवों के साथ पिछले जन्म को जानने का द्वार भी खुलने लगेगा। जैन धर्म में जाति स्मरण के ज्ञान पर विस्तार से उल्लेख मिलता है।
* क्यों जरूरी ध्यान : ध्यान के अभ्यास में जो पहली क्रिया सम्पन्न होती है वह भूलने की, कचरा स्मृतियों को खाली करने की होती है। जब तक मस्तिष्क कचरा ज्ञान, तर्क और स्मृतियों से खाली नहीं होगा, नीचे दबी हुई मूल प्रज्ञा जाग्रत नहीं होगी। इस प्रज्ञा के जाग्रत होने पर ही जाति स्मरण ज्ञान (पूर्व जन्मों का) होता है। तभी पूर्व जन्मों की स्मृतियां उभरती हैं।
* सावधानी : सुबह और शाम का 15 से 40 मिनट का विपश्यना ध्यान करना जरूरी है। मन और मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का विकार हो तो जाति स्मरण का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह प्रयोग किसी योग शिक्षक या गुरु से अच्छे से सिखकर ही करना चाहिए। सिद्धियों के अनुभव किसी आम जन के समक्ष बखान नहीं करना चाहिए। योग की किसी भी प्रकार की साधना के दौरान आहार संयम जरूरी रहता है।
(यह प्रयास श्रीगुरु चरणों में समर्पित, जो स्वयं इसका आधार हैं)
अभिनव वशिष्ठ.
Friday, 1 June 2012
घर के मंदिर की ऊर्जा कैसे बढायें ?
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भगवान की भक्ति के लिए सभी के घरों में देवस्थान या मंदिर अवश्य ही होते हैं लेकिन अधिकांश लोग इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि घर में मंदिर की स्थिति से हमारे जीवन पर कितना गहरा प्रभाव पडता है | घर में मंदिर की जैसी स्थिति होती है, वहां रहने वाले सदस्यों का जीवन भी वैसा ही होता है | जिन लोगों के घर में मंदिर का आकार दोष पूर्ण होता है, उन्हें कई प्रकार के कष्टों के साथ मानसिक अशांति एवं धन की कमी का सामना करना पड़ता है। मंदिर से अच्छे और शुभ फल प्राप्त करना हो तो मंदिर का आकार पिरामिड जैसा होना चाहिए | प्राचीन काल से ही मंदिरों का शिखर पिरामिड के आकार का ही बनाया जाता है और इससे कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं |
मंदिर का शिखर पिरामिड के आकार होना बहुत शुभ माना जाता है | इसी वजह से बड़े-बड़े मंदिरों के शिखर भी पिरामिड के आकार के ही होते हैं | घर में पिरामिड के आकार का शिखर वाला मंदिर होने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है जिसके प्रभाव से परिवार के सभी सदस्यों की चिंताएं दूर हो जाती हैं, मन की सारी अंशाति, आत्मिक शांति में बदल जाती है | पिरामिड की बनावट ऐसी होती है कि यह वातावरण से सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करता है | जहां पिरामिड होता है वहां नकारात्मक ऊर्जा यानि बुरी शक्तियां अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती |
वास्तु के अनुसार पिरामिड का शाब्दिक अर्थ है "अग्नि शिखा" | अग्नि शिखा का अर्थ है कि एक ऐसी अदृश्य ऊर्जा जो आग के समान होती है | यह शक्ति पिरामिड के प्रभाव में घर में रहने वाले लोगों को मिलती है | पिरामिड प्रकृति से ऊर्जा एकत्रित करता है | पिरामिड की छोटी-छोटी प्रतिकृतियां अंदर से खाली होती हैं, जो कि विद्युत चुंबकीय वर्ग आदि की ऊर्जा निर्मित करती है। इसी वजह से मंदिरों के शिखर पिरामिड की तरह बनाए जाते हैं, जिससे वहां आने वाले व्यक्तियों को ऊर्जा मिलती रहे | यदि किसी व्यक्ति के घर में पिरामिड के आकार का मंदिर रखना संभव न हो तो वास्तु के अनुसार बताए गए पिरामिड को घर में रख सकते हैं | यह भी काफी सकारात्मक परिणाम देता है |
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी घर के मंदिर का शिखर पिरामिड जैसा बनाने से घर के वास्तु दोष और कई प्रकार के ग्रह दोष भी स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं | ग्रह दोष समाप्त होने पर परिवार के सदस्यों को स्वतः अपने जीवन में सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगते हैं, ऐसा अनुभव होता है कि दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया हो | ऐसे मंदिर के समक्ष प्रार्थना करने पर हमारी इच्छाएं जल्द ही पूर्ण हो जाती हैं | ऐसे मंदिर के समक्ष मंत्रजप, स्तोत्रपाठ, साधनादि का भी विशेष प्रभाव देखने में आता है |
अभिनव वशिष्ठ.
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Thursday, 31 May 2012
*** वेदमाता गायत्री का प्राकट्य दिवस गायत्री जयंती *** गंगावतरण का पर्व गंगा दशहरा (31.05.2012)***
| तत्सवितुर्वरेण्यं |
|| ॐ श्री गुरवे नमः ||
*** वेदमाता गायत्री का प्राकट्य दिवस गायत्री जयंती (31.05.2012) *** *** गंगावतरण का पर्व गंगा दशहरा (31.05.2012)***-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
*** गायत्री जयंती ***
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हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा जाता है अर्थात सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है। गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी भी कहा जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मां गायत्री का अवतरण माना जाता है। इस दिन को हम गायत्री जयंती के रूप में मनाते है। इस बार गायत्री जयंती का पर्व 31 मई को है।
धर्म ग्रंथों में यह भी लिखा है कि गायत्री उपासना करने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा उसे कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होती। गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं (ॐ स्तुता मया वरदा..... ||), जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते हैं। विधिपूर्वक की गयी उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विपत्तियों के समय उसकी रक्षा करती है।
हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है जिसका अर्थ है यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। यही कारण है गायत्री को सभी शक्तियों का आधार माना गया है इसीलिए भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को प्रतिदिन गायत्री उपासना अवश्य करनी चाहिए।
*** गंगा दशहरा ***
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हिंदू जनमानस में गंगा स्नान का विशेष महत्व है। गंगा भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की पवित्रतम नदी है। इस तथ्य को भारतीय तो मानते ही है, विदेशी विद्वान भी इसे स्वीकार करते है। जिस प्रकार संस्कृत भाषा को देववाणी कहा जाता है, उसी प्रकार गंगाजी को देवनदी कहा जाता है।
* प्रचलित मान्यता :-
ऐसा माना जाता है कि गंगा जी स्वर्गलोक से ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को पृथ्वी पर उतरी थीं (जबकि भगवती गंगा की उत्पत्ति श्रीहरि के चरणकमलों से वैशाख शुक्ल सप्तमी को मानी जाती है )। इसी दिन सूर्यवंशी राजा भगीरथ की पीढि़यों का परिश्रम और तप सफल हुआ था। उनके घोर तप के फलस्वरूप गंगाजी ने शुष्क तथा उजाड़ प्रदेश को उर्वर तथा शस्य श्यामल बनाया और भय-ताप से दग्ध जगत के संताप को मिटाया। उसी मंगलमय सफलता की पुण्य स्मृति में गंगा पूजन की परंपरा प्रचलित है।
* भारतीय संस्कृति और गंगा :-
गंगा, गीता और गौ को भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व दिया गया है। प्रत्येक आस्तिक भारतीय गंगा को अपनी माता समझता है। गंगा में स्नान का अवसर पाकर कृत-कृत्य हो जाता है। गंगा दशहरा के दिन गंगा के प्रति अपनी सारी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। ऐसा माना जाता है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान और पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते है। गंगा दशहरा के दिन यदि संभव हो तो गंगा स्नान अवश्य करना चाहिए अथवा किसी अन्य नदी, जलाशय में या घर के ही शुद्ध जल से गंगाजल मिलाकर स्नान करें, लेकिन गंगा जी का स्मरण और पूजन अवश्य करें।
नाम मंत्र के साथ निम्न मंत्र का प्रयोग भी किया जा सकता है-
नमो भगवत्यै दशपापहरायै गंगायै नारायण्यै रेवत्यै |
शिवायै अमृतायै विश्वरूपिण्यै नंदिन्यै ते नमो नम: ||
गंगा पूजन के साथ उनको भूतल पर लाने वाले राजा भागीरथ और उद्गम स्थान हिमालय का भी पूजन नाम मंत्र से करना चाहिए। इस दिन गंगा जी को अपनी जटाओं में समेटने वाले भगवान शिव की भी पूजा करनी चाहिए। संभव हो तो इस दिन दस फूलों और तिल आदि का दान भी करना चाहिए।
* अथक भागीरथ प्रयन्न
गंगा जी की कृपा से भारत का मानचित्र ही बदल गया है। गंगावतरण के प्रमुख साधक भगीरथ की साधना, तप और अति विकट परिश्रम ने यह अमृत फल प्रदान किया है। उनके इस कठिन प्रयत्न की वजह से ही भगीरथ प्रयत्न एक मुहावरा बन गया है और गंगा जी का एक नाम भागीरथी पड़ गया। गंगावतरण की तिथि गंगा दशहरा के दिन हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी में गंगा स्नान, गंगा पूजन और दान का विशेष महत्व है।
अतः ऐसे पवित्र दिन में यथासंभव पवित्र रहकर भगवती गंगा व वेदमाता गयात्री का पूजन-अर्चन करना चाहिये |
आप सभी को अनंत शुभकामनायें...
अभिनव वशिष्ठ.
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Friday, 25 May 2012
सनातन संस्कृति की सप्त-पुरियाँ
|| तत्सवितुर्वरेण्यं ||
|| ॐ श्री गुरवे नमः ||
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सनातन संस्कृति की सप्त-पुरियाँ...
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शास्त्रों में मुक्ति के पांच प्रकार बताये गये हैं...
१) ब्रह्म-ज्ञान
२) भक्ति द्वारा भगवत-कृपा प्राप्ति...
३) पुत्र-पौत्रादि, गोत्रज, कुटुम्बियो आदि द्वारा गया आदि तीर्थो में संपादित श्राद्ध कर्म...
४) धर्म-युद्ध और गौ-रक्षा आदि में मृत्यु...
५) कुरुक्षेत्र, पुष्कर आदि प्रधान तीर्थो में और सप्त प्रधान मोक्ष-दायिनी पुरियो में निवास-पूर्वक शरीर-त्याग
सभी तीर्थ फल देने वाले और पुण्य प्रदान करने वाले होते हैं... अपनी अद्भुत विशेषताओं के कारण यह सप्त-पुरिया अत्यंत प्रसिद्द हैं...
" अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका |
पुरी द्वारावती श्रेया: सप्तैता मोक्षदायका: ||"
१) अयोध्या... यह सात मोक्षदायिनी पुरियो में प्रथम है... यह भगवान् श्री हरि के सुदर्शन चक्र पर बसी है...भगवान् राम की जन्म-भूमि होने के कारण इसका महत्व बहुत अधिक है... इसका आकार मछली के समान है... स्कन्द-पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या माहात्म्य के अनुसार... अयोध्या का मान सहस्त्र-धारा तीर्थ से एक योजन पूर्व तक, ब्रह्म-कुण्ड से एक योजन पश्चिम तक... दक्षिण में तमसा नदी तक... और उत्तर में सरयू नदी तक है...अयोध्या में ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित ब्रह्म-कुण्ड है...और सीता जी द्वारा निर्मित सीता-कुण्ड भी है, जिसे भगवान् राम ने समस्त मनोकामनाओ को पूर्ण करने वाला बना दिया है... यहाँ सहस्त्र-धारा से पूर्व स्वर्ग-द्वार है... इस स्थान पर हवन , यज्ञ, दान पुण्य आदि अक्षय हो जाता है |
२) मथुरा-वृन्दावन... यह यमुना जी के दोनों तरफ बसा है... यमुना जी के दक्षिण भाग में इसका विस्तार ज्यादा है... यमुना जी का भी महत्व है...क्योंकि यमुना जी सूर्य-पुत्री हैं और यमराज की बहन हैं... श्रीकृष्ण की प्रेमिका हैं (कालिन्दी के रुप में पत्नी हैं)... और भगवान् श्रीकृष्ण की जन्म-भूमि होने से इसका महत्व बहुत ज्यादा है |
३) हरिद्वार [ मायापुरी ]... यह तीसरी पवित्र पुरी है... यह एक शक्तिपीठ भी है... कनखल से ऋषिकेश तक का क्षेत्र मायापुरी कहलाता है... गंगा माता पर्वतों से उतरकर सर्वप्रथम यहीं समतल भूमि पर प्रवेश करती हैं... और मनुष्यों के पापो की निवृत्ति करती हैं |
४) काशी जी [ वाराणसी ]... यह नगरी भगवान् शिव के त्रिशूल पर बसी है... इस नगरी के लिए कहा जाता है की यह प्रलय काल में भी नष्ट नहीं होगी... 'वरुण' और 'असी' के मध्य होने से इसे वाराणसी कहा गया है... यहाँ पर सैंकड़ो घाट हैं... और विश्वेश्वर लिंग स्वरुप विश्वनाथ मंदिर... अन्नपूर्णा मंदिर... संकट-मोचन मंदिर... गीता मंदिर... भारतवर्ष का प्रथम भारतमाता मंदिर और सहस्त्रों अन्य मंदिर और पवित्र तीर्थ स्थान हैं... जो काशी जी की शोभा और माहात्म्य को बढाते हैं |
५) कांची... पेलार नदी के तट पर स्थित शिव-कांची और विष्णु-कांची नामो से विभक्त हरी-हरात्मक पुरी है...शिव-कांची विष्णु-कांची से बड़ी है... यह मद्रास से ७५ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित है... यहाँ वामन मंदिर... कामाख्या मंदिर... सुब्रह्मण्यम मंदिर आदि तीर्थ स्थल हैं...और सर्वतीर्थ सरोवर भी हैं |
६) उज्जैन [अवंतिका] ... उज्जैन को पृथ्वी की नाभि कहा जाता है... यहाँ महाकाल ज्योतिर्लिंग और हरसिद्धि देवी शक्तिपीठ प्रसिद्द है... सम्राट विक्रमादित्य के समय में यह सम्पूर्ण भारत की राजधानी रही है... यह मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से ११५ किलोमीटर पश्चिम में है... यहाँ क्षिप्रा नदी शहर के बीचों-बीच से बहती है... यहाँ असंख्यो मंदिर हैं... पुरातन काल में ऐसा कहा जाता था कि यदि १०० बैल-गाडी अनाज की भर कर यहाँ लायी जाए और एक-एक मुट्ठी अनाज यहाँ के हर मंदिर में दिया जाए... तो अनाज कम पड़ जायगा परन्तु मंदिरों की गिनती पूर्ण नहीं होगी |
७) द्वारिका... द्वारिका पुरी सप्त-पुरीयों के साथ ही चार धामों में भी परिगणित है... यह सातवी पुरी है जो गुजरात प्रदेश के जामनगर जिले के पश्चिम समुद्र तट पर स्थित है... भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने जीवन का अधिकांश समय यहीं व्यतीत किया था... यहाँ अनेको मंदिर और तीर्थ-स्थल हैं |
|| हरिहराय नमः ||
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अभिनव वशिष्ठ.
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Sunday, 20 May 2012
सूर्यग्रहण (20/21 मई 2012) : जानिये कैसा रहेगा आपके लिए
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दिनाँक 21 मई 2012 ई. (पूर्वोत्तर असम आदि राज्यों में ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या) सोमवार को प्रातः सूर्योदय से पहले होने वाला सूर्यग्रहण भारत के पूर्वोत्तर राज्यों यथा - अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड सहित पश्चिम बंगाल के उत्तरी नगरों में सूर्योदय के आसन्न काल में ग्रस्तोदय खण्डग्रास रुप में कुछ मिनटों के लिए दिखाई देगा | इन राज्यों में यह सूर्यग्रहण सूर्योदय बाद कम से कम एक मिनट तथा अधिकतम 30 मिनट तक दिखाई देगा | राजस्थान, दिल्ली सहित भारत के पश्चिमी राज्यों में यह ग्रहण कहीं भी दिखाई नहीं देगा |
यह सूर्यग्रहण भारत के पूर्वी राज्यों के साथ-साथ मध्या रूस, चीन, दक्षिणी कोरिया, जापान, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, उत्तरी अमेरिका तथा पैसिफिक महासागर में भी दिखाई देगा | इस सूर्यग्रहण की कंकणाकृति टोकियो (जापान), ताइवान, हांगकांग, न्यू मैक्सिको, एरीजोना, नेवाडा में दिखाई देगी |
नोट:- यह सूर्यग्रहण राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, जम्मू कश्मीर, तमिलनाडू आदि राज्यों में दिखाई नहीं देगा | अतः यहाँ ग्रहणादि सूतक व दान, जप आदि मानने व करने की कोई आवश्यकता नहीं है |
सूर्यग्रहण के स्पर्शादि काल भारतीय स्टैंडर्ड टाईम में इस प्रकार है:-
ग्रहण की स्थिति समय (घं.मि.)
ग्रहण प्राम्भ 2 : 26
ग्रहण (कंकण) प्राम्भ 3 : 37
ग्रहण मध्य 5 : 23
ख़ग्रास (कंकण) समाप्त 7 : 08
ग्रहण समाप्त 8 : 19
ग्रहण का सूतक - भारत के पूर्वोत्तर राज्यों "जहाँ यह सूर्यग्रहण दिखाई देगा" वहाँ इस ग्रहण का सूतक 20 मई 2012 को सायंकाल सूर्यास्त के समय से प्राम्भ हो जयेगा |
ग्रहण का राशिफल - यह ग्रहण कृतिका नक्षत्र एवं वृष राशि में हो रहा है, अत: कृतिका नक्षत्र व वृष राशि में जन्में व्यक्तियों को विशेष कष्टदायक रहेगा |
मेषादि बारह राशियों पर इस ग्रहण का फल निम्न होगा :-
मेष - व्यय वृद्धि
वृष - चोट भय
मिथुन - धन हानि
कर्क - लाभ, उन्नति
सिंह - सुख - समृद्धि
कन्या - मनहानि भय
तुला - दुर्घटना भय
वृश्चिक - दाम्पत्य कष्ट
धनु - कार्यसिद्धि
मकर - मन अशांत
कुंभ - रोग भय
मीन - आर्थिक लाभ
अतएव सावधान रहें व सूर्यपूजन अवश्य करें
अभिनव वशिष्ठ.
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Saturday, 19 May 2012
शनि जयन्ती : ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या : 20.5.2012
शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन ग्रहाधिपति सूर्यदेव के यहाँ देवी छाया के गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ था | इस संवत में यह सुयोग कल अर्थात 20 मई को पड रहा है | कुछ स्थानों पर इसे "बडपूजन अमावस्या " या "भावुका अमावस्या" भी कहा जाता है |
महापुरूषों के मतानुसार इस दिन शनिदेव का पूजन अत्यंत शुभ फलदायी रहता है, खासकर उन व्यक्तियों के लिए जो पूर्व जन्मकृत कर्मों के कारण शनि से पीड़ित हों |
शनिदेव दण्डाधिकारी माने गए हैं। उनका ऐसा चरित्र असल में, कर्म और सत्य को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है। जीवन में परिश्रम और सच्चाई ही ऐसी खूबियां हैं, जिन पर कठिन दौर में भी टिके रहना बड़ी सफलता व यश देने वाला होता है।
यही कारण है कि आने वाले कल को खुशहाल बनाने के लिए वर्तमान में कर्म में संयम और अनुशासन को अपनाने का संकल्प लेना अहम हैं। शुभ संकल्पों को अपनाने के लिए ही शनि जयंती के इस संयोग में शनि पूजा व उपासना आने वाले समय को दु:ख, कलह, असफलता से दूर रख सफलता व सुख लाएगी।
धर्मशास्त्रों व ज्योतिष विज्ञान में शनि पीड़ा या कुण्डली में शनि की महादशा, साढ़े साती या ढैय्या में शनि के अशुभ प्रभावों से बचाव के लिए शनि व्रत रखने का भी बहुत महत्व बताया गया है। चूंकि हर धार्मिक कर्म का शुभ फल तभी मिलता है, जब उसका पालन विधिवत किया जाए। इसलिए जानते हैं शनि अमावस्या के योग में व्रत पालन में स्नान, पूजा, दान और आहार कैसा हो?
स्नान -
शनि उपासना के लिए सबेरे शरीर पर खासकर पैरों की ऊँगलियों पर हल्का सरसों तेल लगाएं। बाद में शुद्ध जल में पवित्र नदी का जल, काले तिल मिलाकर स्नान करें।
शनि पूजा -
शनिदेव को गंगाजल से स्नान कराएं। तिल या सरसों का तेल, काले तिल, काली उड़द, काला वस्त्र, काले या नीले फूल के साथ तेल से बने व्यंजन का नैवेद्य चढ़ाएं।
शनि मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। तेल के दीप से शनि आरती करें।
दान -
शनि व्रत में शनि की पूजा के साथ दान भी जरूरी है। शनि के कोप की शांति के लिए शास्त्रों में बताई गई शनि की इन वस्तुओं का दान करें। साबुत उड़द, तेल, काले तिल, नीलम रत्न, काली गाय, भैंस, काला कम्बल या नीला-काला कपड़ा, लोहा या इससे बनी वस्तुएं और दक्षिणा किसी भार्गव (राजस्थान में इन्हें डाकोत कहा जाता है, शनि मंदिर में पुजारी भी यही हुआ करते हैं) को दान करना चाहिए यदि ऐसा संभव ना हो तो किसी शनि मंदिर में उपरोक्त वस्तुएँ चढा देनी चाहिये।
खान-पान -
शनि की अनुकूलता के लिए रखे गए व्रत में यथासंभव उपवास रखें या एक समय भोजन का संकल्प लें। इस दिन शुद्ध और पवित्र विचार और व्यवहार बहुत जरूरी है। आहार में दूध, लस्सी और फलों का रस लेवें। अगर व्रत न रख सकें तो काले उड़द की खिचड़ी में काला नमक मिलाकर या काले उड़द का हलवा खा सकते हैं।
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आशा है आप सभी इस सुअवसर का लाभ उठायेंगे |
अभिनव वशिष्ठ.
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Sunday, 6 May 2012
|| धम्मं शरणं गच्छामि ||
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आज है वैशाख शुक्ल पू्र्णिमा....बुद्ध पू्र्णिमा...पीपल पू्र्णिमा,
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वह दिन जब राजकुमार गौतम बोध को प्राप्त हुए और और वे "तथागत बुद्ध" कहलाये |
इस दिन को पीपल पू्र्णिमा इसलिए कहते हैं क्योंकि भगवान गौतम बुद्ध का संपूर्ण तप पीपल के सान्निध्य में ही हुआ था | इसीलिये बौद्ध मत में भी पीपल की अत्यधिक मान्यता है | पीपल को श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने अपना ही स्वरूप बताया है (अश्वत्थ सर्ववृक्षाणां.), और शास्त्र में पीपल के सान्निध्य में किए गए जप, तप, ध्यान आदि को अत्यन्त फलदायी बताया गया है और बुद्धावतार में स्वयं भगवान ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है |
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शास्त्र में पीपल पू्र्णिमा को "स्वयंसिद्ध अबूझ मुहूर्त्त" बताया गया है | आज का दिन यज्ञ, दान आदि सभी मांगलिक कार्यों के लिए भी अत्यन्त पुण्यदायी बताया गया है | आशा है आप सभी इस अवसर का लाभ उठायेंगे |
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आप सभी को शुभकामनायें...
Saturday, 5 May 2012
श्रीकूर्म जयंती (इस वर्ष 5-मई-2012)
आज श्रीकूर्म जयंती है |
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समुद्र मंथन का प्रसंग हम सभी ने अनेक माध्यमों से सुना - पढा - समझा है |
जब देवताओं व दैत्यों ने अमृत प्राप्ति के लिये मंदराचल पर्वत को मथनी व नागराज वासुकि को रस्सी बनाकर मंथन आरंभ किया तो मंदराचल समुद्र में धँसने लगा तब श्रीहरि ने कूर्म (कच्छप) अवतार लिया और मंदराचल का आधार बने तब सभी ने मिलकर समुद्र मंथन किया | आगे की कथा तो आप सभी जानते ही हैं लेकिन ये कम ही लोग जानते होंगे कि आज ही का वह पवित्र दिन है जब श्रीहरि ने "कूर्मावतार" लिया था | "कूर्मावतार" श्रीहरि के प्रधान दस अवतारों में दूसरा कहा गया है |
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|| ॐ नमो नारायणाय ||
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समुद्र मंथन का प्रसंग हम सभी ने अनेक माध्यमों से सुना - पढा - समझा है |
जब देवताओं व दैत्यों ने अमृत प्राप्ति के लिये मंदराचल पर्वत को मथनी व नागराज वासुकि को रस्सी बनाकर मंथन आरंभ किया तो मंदराचल समुद्र में धँसने लगा तब श्रीहरि ने कूर्म (कच्छप) अवतार लिया और मंदराचल का आधार बने तब सभी ने मिलकर समुद्र मंथन किया | आगे की कथा तो आप सभी जानते ही हैं लेकिन ये कम ही लोग जानते होंगे कि आज ही का वह पवित्र दिन है जब श्रीहरि ने "कूर्मावतार" लिया था | "कूर्मावतार" श्रीहरि के प्रधान दस अवतारों में दूसरा कहा गया है |
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|| ॐ नमो नारायणाय ||
छिन्नमस्ता जयंती 5 मई 2012
|| ॐ छिन्नमस्तिकायै नम: ||
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दस महा विद्याओं में छिन्नमस्ता माता छठी महाविद्या कहलाती हैं | इस वर्ष देवी छिन्नमस्ता जयंती 5 मई 2012, शनिवार के दिन मनाई जाएगी | छिन्नमस्ता देवी को "मां चिंतपूर्णी" के नाम से भी जाना जाता है | देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है. "मार्कंडेय पुराण" व "शिव पुराण" आदि में देवी के इस रूप का विशद वर्णन किया गया है |
एक कथा के अनुसार जब देवी ने चंडी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया, दैत्यों को परास्त करके देवों को विजय दिलवाई तो चारों ओर उनका जय घोष होने लगा, परंतु देवी की सहायक योगिनियाँ अजया और विजया की रुधिर पिपासा शांत नहीँ हो पाई थी | इस पर उनकी रक्त पिपासा को शांत करने के लिए माँ ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी रक्त प्यास बुझाई जिस कारण माता को छिन्नमस्ता नाम से भी पुकारा जाने लगा.
माना जाता है की जहां भी देवी छिन्नमस्ता का निवास हो वहां पर चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी होता है | इस बात की सत्यता इस जगह से साबित हो जाती हैं क्योंकी मां के इस स्थान के चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी है. यहां पर कालेश्वर महादेव व मुच्कुंड महादेव तथा शिववाड़ी जैसे शिव मंदिर स्थापित हैं.
देवी छिन्नमस्ता की उत्पति कथा | (मतांतर से इसी कथा को प्रामाणिक माना जाता है)
छिन्नमस्ता के प्रादुर्भाव की एक कथा इस प्रकार है- भगवती भवानी अपनी दो सहचरियों के संग मन्दाकिनी नदी में स्नान कर रही थी | स्नान करने पर दोनों सहचरियों को बहुत तेज भूख लगी | भूख की पीडा से उनका रंग काला हो गया | तब सहचरियों ने भोजन के लिये भवानी से कुछ मांगा, भवानी के कुछ देर प्रतीक्षा करने के लिये उनसे कहा, किन्तु वह बार-बार भोजन के लिए हठ करने लगी | तत्पश्चात् सहचरियों ने नम्रतापूर्वक अनुरोध किया - "मां तो भूखे शिशु को अविलम्ब भोजन प्रदान करती है " ऎसा वचन सुनते ही भवानी ने अपने खड़्ग से अपना ही सिर काट दिया, कटा हुआ सिर उनके बायें हाथ में आ गिरा और तीन रक्तधाराएं बह निकली | दो धाराओं को उन्होंने सहचरियों की और प्रवाहित कर दिया, जिन्हें पान कर दोनों तृ्प्त हो गई | तीसरी धारा जो ऊपर की बह रही थी, उसे देवी स्वयं पान करने लगी, तभी से वह "छिन्नमस्ता" के नाम से विख्यात हुई हैं |
छिन्नमस्तिका जयंती महत्व
माता छिन्नमस्ता को शाक्त्यों की "कौलाचार परम्परा" में अतिविशिष्ट स्थान प्राप्त है | माता छिन्नमस्ता की पूजन प्रक्रिया में पंच "म" कार क्रम का अनेक तांत्रिक पुरातन कल से प्रयोग करते आए हैं, चूँकि ये आमजनों के चिंतन से परे का विषय है इसलिए आमजन इनके पूजन से अनभिज्ञ रहते हैं | लेकिन फिर भी माता का प्रत्येक स्वरूप पूजनीय है इसलिए संभव हो तो इनका चित्रपट पूजन अथवा दुर्गाजी का पूजन किया जा सकता है |
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आप सभी को मंगलकामनायें...
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दस महा विद्याओं में छिन्नमस्ता माता छठी महाविद्या कहलाती हैं | इस वर्ष देवी छिन्नमस्ता जयंती 5 मई 2012, शनिवार के दिन मनाई जाएगी | छिन्नमस्ता देवी को "मां चिंतपूर्णी" के नाम से भी जाना जाता है | देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है. "मार्कंडेय पुराण" व "शिव पुराण" आदि में देवी के इस रूप का विशद वर्णन किया गया है |
एक कथा के अनुसार जब देवी ने चंडी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया, दैत्यों को परास्त करके देवों को विजय दिलवाई तो चारों ओर उनका जय घोष होने लगा, परंतु देवी की सहायक योगिनियाँ अजया और विजया की रुधिर पिपासा शांत नहीँ हो पाई थी | इस पर उनकी रक्त पिपासा को शांत करने के लिए माँ ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी रक्त प्यास बुझाई जिस कारण माता को छिन्नमस्ता नाम से भी पुकारा जाने लगा.
माना जाता है की जहां भी देवी छिन्नमस्ता का निवास हो वहां पर चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी होता है | इस बात की सत्यता इस जगह से साबित हो जाती हैं क्योंकी मां के इस स्थान के चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी है. यहां पर कालेश्वर महादेव व मुच्कुंड महादेव तथा शिववाड़ी जैसे शिव मंदिर स्थापित हैं.
देवी छिन्नमस्ता की उत्पति कथा | (मतांतर से इसी कथा को प्रामाणिक माना जाता है)
छिन्नमस्ता के प्रादुर्भाव की एक कथा इस प्रकार है- भगवती भवानी अपनी दो सहचरियों के संग मन्दाकिनी नदी में स्नान कर रही थी | स्नान करने पर दोनों सहचरियों को बहुत तेज भूख लगी | भूख की पीडा से उनका रंग काला हो गया | तब सहचरियों ने भोजन के लिये भवानी से कुछ मांगा, भवानी के कुछ देर प्रतीक्षा करने के लिये उनसे कहा, किन्तु वह बार-बार भोजन के लिए हठ करने लगी | तत्पश्चात् सहचरियों ने नम्रतापूर्वक अनुरोध किया - "मां तो भूखे शिशु को अविलम्ब भोजन प्रदान करती है " ऎसा वचन सुनते ही भवानी ने अपने खड़्ग से अपना ही सिर काट दिया, कटा हुआ सिर उनके बायें हाथ में आ गिरा और तीन रक्तधाराएं बह निकली | दो धाराओं को उन्होंने सहचरियों की और प्रवाहित कर दिया, जिन्हें पान कर दोनों तृ्प्त हो गई | तीसरी धारा जो ऊपर की बह रही थी, उसे देवी स्वयं पान करने लगी, तभी से वह "छिन्नमस्ता" के नाम से विख्यात हुई हैं |
छिन्नमस्तिका जयंती महत्व
माता छिन्नमस्ता को शाक्त्यों की "कौलाचार परम्परा" में अतिविशिष्ट स्थान प्राप्त है | माता छिन्नमस्ता की पूजन प्रक्रिया में पंच "म" कार क्रम का अनेक तांत्रिक पुरातन कल से प्रयोग करते आए हैं, चूँकि ये आमजनों के चिंतन से परे का विषय है इसलिए आमजन इनके पूजन से अनभिज्ञ रहते हैं | लेकिन फिर भी माता का प्रत्येक स्वरूप पूजनीय है इसलिए संभव हो तो इनका चित्रपट पूजन अथवा दुर्गाजी का पूजन किया जा सकता है |
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आप सभी को मंगलकामनायें...
Monday, 16 April 2012
फेंगशुई : चीन का सांस्कृतिक हमला
फेंगशुई भारत पर सुनियोजित तरीके से किया गया चीन का सांस्कृतिक हमला है। लॉफिंग बुद्धा कोई देवता नहीं, जिससे घर में समृद्धि आती है, बल्कि वह साम्यवादी देश का एक राजा था। भारतीय वास्तु शास्त्र पूर्णत: वैज्ञानिक है। इसके माध्यम से हमारी शक्तियों को सकारात्मक ऊर्जा में तब्दील किया जा सकता है।
चीन अपने उत्पादों को भारत में बेच रहा है और इसके लिए उसने फेंगशुई को हथियार बनाया है। फेंगशुई के माध्यम से लोगों को गुमराह किया जा रहा है। इन प्रतीकों में कोई सकारात्मक ऊर्जा नहीं होती। हां, इतना अवश्य है कि इनके जरिए चीन करीब 20 हजार करोड़ रुपए का सालाना कारोबार कर रहा है।
बच्चों के कमरों में कभी भी ड्रैगन नहीं लगाना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है और बच्चों के मन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। फेंगशुई का कोई वैज्ञानिक आधार भी नहीं है। लॉफिंग बुद्धा की बजाय हमारे ही देवी-देवताओं को घरों में स्थापित करना चाहिए क्योंकि इनमें अधिक सामर्थ्य है और इनसे हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है।
ज्योतिष सृष्टि के उदय से प्रलय काल तक की सभी घटनाओं का आधार स्तंभ है। ज्योतिष तथा समय का विवरण अंक शास्त्र के अनुसार प्राप्त होता है, जिसका आकलन विशुद्ध गणितीय विज्ञान के जरिए किया जाता है, जबकि वास्तु परिवेश की ऊर्जा को घटाने और बढ़ाने का विज्ञान है। इन दोनों के उचित समन्वय के द्वारा मानव और मानवता का कल्याण होता है। जिस तरह सूर्य की जीवनदायिनी किरणें घर में प्रवेश के साथ नए जीवन का संचार करती हैं, ठीक उसी तरह वास्तु भी सकारात्मक ऊर्जा को एकत्रित करने की कला है, जो कि पूर्णत: वैज्ञानिक है।
Monday, 26 December 2011
पीपल को पूजते हैं, क्योंकि...
पीपल के वृक्ष को हिंदुओं में देवताओं का निवास स्थान बताया गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवता पीपल में निवास करते हैं। मृत हिंदू के लिए एक घट पीपल की शाखाओं में बांधा जाता है। सोमवती अमावस्या को सौभाग्यवती स्त्रियां पीपल का पूजन कर अपने पति की लंबी आयु के लिए करती है। महात्मा बुद्ध ने पीपल के नीचे बैठकर ही ज्ञान प्राप्त किया था। इसलिए उसे 'बोधिवृक्ष भी कहा जाता है।
आयुर्वेद में भी पीपल का कई औषधि के रूप में प्रयोग होता है। श्वास, तपेदिक, रक्त-पित्त,विषदाह,भूख बढ़ाने के लिए यह वरदान है। शास्त्रों में भी पीपल को बहुपयोगी माना गया है तथा उसका धार्मिक महत्व बनाकर काटने का निषेध किया गया है।हिंदू और बौद्ध धर्म में इसको सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त है। केवल भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी इसको पवित्र माना जाता है। तिब्बत में 'लालचंड, नेपाल में 'बंगलसिमा, बर्मा में 'स्याम, श्रीलंका में इसका 'शोलबो नाम से पुकारते हैं। बुद्ध जनता इसे 'बोधिवृक्ष कहती है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इसे स्वयं अपने ही समान कहा है।
आयुर्वेद में भी पीपल का कई औषधि के रूप में प्रयोग होता है। श्वास, तपेदिक, रक्त-पित्त,विषदाह,भूख बढ़ाने के लिए यह वरदान है। शास्त्रों में भी पीपल को बहुपयोगी माना गया है तथा उसका धार्मिक महत्व बनाकर काटने का निषेध किया गया है।हिंदू और बौद्ध धर्म में इसको सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त है। केवल भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी इसको पवित्र माना जाता है। तिब्बत में 'लालचंड, नेपाल में 'बंगलसिमा, बर्मा में 'स्याम, श्रीलंका में इसका 'शोलबो नाम से पुकारते हैं। बुद्ध जनता इसे 'बोधिवृक्ष कहती है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इसे स्वयं अपने ही समान कहा है।
ताविज क्यों पहनते हैं?
अक्सर देखने में आता है कि कई लोग गले में काले रंग के धागे में किसी धातु या लाल-काले रंग के कपड़े का टुकड़ा पहनते हैं। यही ताविज कहलाता है। सामान्यत: सभी छोटे बच्चों को तो अनिवार्य रूप से ताविज बांधा जाता है। कई लोग ताविज बांधने को अंधविश्वास मानते हैं परंतु ऐसा नहीं है। इसके स्वास्थ्य संबंधी कई फायदे भी होते हैं।
ताविज बांधने की परंपरा हर धर्म में मानी जाती है। यह अति प्राचीनकालीन प्रथा है। जिसे आज भी अधिकांश लोग मानते हैं। ताविज बांधने से बुरी नजर नहीं लगती है। वहीं कई लोग मंत्रों से सिद्ध किए ताविज धारण करते हैं। मंत्रों की शक्ति से सभी भलीभांति परिचत हैं। किसी सिद्ध संत या महात्मा द्वारा अपनी मंत्र शक्ति से ताविज बनाकर दिए जाते हैं। यह ताविज बीमारियों से निजात पाने के लिए बनवाए जाते हैं।
ताविज में एक धागा होता है। इस धागे में किसी कपड़े में या धातु की छोटी सी डिबिया होती है। इस कपड़े या डिबिया में कोई मंत्र लिखा भोज पत्र, भभूती, सिंदूर के साथ कई लोग इसमें तांत्रिक वस्तुएं भी रखते हैं।
मान्यता है कि ताविज के प्रभाव से वातावरण में मौजूद नकारात्मक शक्तियां हमें प्रभावित नहीं कर पाती। साथ ही ताविज का धागा हमें दूसरों की बुरी नजर से बचाता है। ताविज का मंत्र लिखा भोज पत्र या भगवान की भभूति या सिंदूर आदि मंत्रों के बल सिद्ध किए होते हैं जो धारण करने वाले व्यक्ति के लिए शुभ रहते हैं।
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ताविज बांधने की परंपरा हर धर्म में मानी जाती है। यह अति प्राचीनकालीन प्रथा है। जिसे आज भी अधिकांश लोग मानते हैं। ताविज बांधने से बुरी नजर नहीं लगती है। वहीं कई लोग मंत्रों से सिद्ध किए ताविज धारण करते हैं। मंत्रों की शक्ति से सभी भलीभांति परिचत हैं। किसी सिद्ध संत या महात्मा द्वारा अपनी मंत्र शक्ति से ताविज बनाकर दिए जाते हैं। यह ताविज बीमारियों से निजात पाने के लिए बनवाए जाते हैं।
ताविज में एक धागा होता है। इस धागे में किसी कपड़े में या धातु की छोटी सी डिबिया होती है। इस कपड़े या डिबिया में कोई मंत्र लिखा भोज पत्र, भभूती, सिंदूर के साथ कई लोग इसमें तांत्रिक वस्तुएं भी रखते हैं।
मान्यता है कि ताविज के प्रभाव से वातावरण में मौजूद नकारात्मक शक्तियां हमें प्रभावित नहीं कर पाती। साथ ही ताविज का धागा हमें दूसरों की बुरी नजर से बचाता है। ताविज का मंत्र लिखा भोज पत्र या भगवान की भभूति या सिंदूर आदि मंत्रों के बल सिद्ध किए होते हैं जो धारण करने वाले व्यक्ति के लिए शुभ रहते हैं।
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Friday, 23 December 2011
शनिश्चरी अमावस्या : 24 दिसंबर 2011 : शनि को मनाने का उपाय : कल करें ऐसी शनि पूजा
शनिदेव दण्डाधिकारी माने गए हैं। उनका ऐसा चरित्र असल में, कर्म और सत्य को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है। जीवन में परिश्रम और सच्चाई ही ऐसी खूबियां हैं, जिन पर कठिन दौर में भी टिके रहना बड़ी सफलता व यश देने वाला होता है।
यही कारण है कि आने वाले कल को खुशहाल बनाने के लिए वर्तमान में कर्म में संयम और अनुशासन को अपनाने का संकल्प लेना अहम हैं। शुभ संकल्पों को अपनाने के लिए ही साल के अंत में बने शनिवार व अमावस्या तिथि के संयोग में शनि पूजा व उपासना आने वाले पूरे साल को दु:ख, कलह, असफलता से दूर रख सफलता व सुख लाएगी।
धर्मशास्त्रों व ज्योतिष विज्ञान में शनि पीड़ा या कुण्डली में शनि की महादशा, साढ़े साती या ढैय्या में शनि के अशुभ प्रभावों से बचाव के लिए शनि व्रत रखने का भी बहुत महत्व बताया गया है। चूंकि हर धार्मिक कर्म का शुभ फल तभी मिलता है, जब उसका पालन विधिवत किया जाए। इसलिए जानते हैं शनि अमावस्या के योग में व्रत पालन में स्नान, पूजा, दान और आहार कैसा हो?
स्नान -
शनि उपासना के लिए सबेरे शरीर पर हल्का तेल लगाएं। बाद में शुद्ध जल में पवित्र नदी का जल, काले तिल मिलाकर स्नान करें।
शनि पूजा -
शनिदेव को गंगाजल से स्नान कराएं। तिल या सरसों का तेल, काले तिल, काली उड़द, काला वस्त्र, काले या नीले फूल के साथ तेल से बने व्यंजन का नैवेद्य चढ़ाएं।
शनि मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। तेल के दीप से शनि आरती करें।
दान -
शनि व्रत में शनि की पूजा के साथ दान भी जरूरी है। शनि के कोप की शांति के लिए शास्त्रों में बताई गई शनि की इन वस्तुओं का दान करें। उड़द, तेल, तिल, नीलम रत्न, काली गाय, भैंस, काला कम्बल या कपड़ा, लोहा या इससे बनी वस्तुएं और दक्षिणा किसी ब्राह्मण को दान करना चाहिए।
खान-पान -
शनि की अनुकूलता के लिए रखे गए व्रत में यथासंभव उपवास रखें या एक समय भोजन का संकल्प लें। इस दिन शुद्ध और पवित्र विचार और व्यवहार बहुत जरूरी है। आहार में दूध, लस्सी और फलों का रस लेवें। अगर व्रत न रख सकें तो काले उड़द की खिचड़ी में काला नमक मिलाकर या काले उड़द का हलवा खा सकते हैं।
Wednesday, 21 December 2011
कोई मरने के बाद बार-बार सपने में आए तो करना चाहिए ये 2 काम...
शास्त्रों के अनुसार जीवन और मृत्यु का चक्र अनवरत चलता रहता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने यही बताया है कि व्यक्ति का शरीर नश्वर होता है। आत्मा अमर होती है जो निश्चित समय के लिए अलग-अलग शरीर धारण करती है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को पुन: नया जन्म मिलता है। जीवन में हमारे कई रिश्ते-नाते बनते हैं, कई लोगों से लगाव होता है। ऐसे में मृत्यु के बाद अक्सर प्रियजनों को मृत व्यक्ति की याद आती है, सपने में भी दिखाई देते हैं।
यदि किसी भी इंसान को सपने में कोई मृत व्यक्ति दिखाई देता है तो उसे ये दो काम अवश्य करना चाहिए। पहला काम है उस मृत व्यक्ति के नाम पर रामायण या श्रीमदभागवत का पाठ कराएं। दूसरा काम है गरीब बच्चों को मिठाई खिलाएं। इसके साथ ही मृत व्यक्ति के नाम से विधि-विधान से तर्पण कराना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार यदि मृत्यु के बाद बार-बार सपनों में आना किसी बात की ओर इशारा होता है। ऐसा माना जाता है कि यदि मरने वाले आत्मा अतृप्त है या उसकी कोई इच्छा अधूरी रह गई है या वह अशांत है तो संबंधित व्यक्ति के सपनों में आकर संकेत देती है। ऐसे में परिवार के सदस्यों को मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए पुण्य कर्म, दान आदि करना चाहिए। इससे वह आत्मा तृप्त होती है और उसे शांति प्राप्त होती है।
यदि किसी भी इंसान को सपने में कोई मृत व्यक्ति दिखाई देता है तो उसे ये दो काम अवश्य करना चाहिए। पहला काम है उस मृत व्यक्ति के नाम पर रामायण या श्रीमदभागवत का पाठ कराएं। दूसरा काम है गरीब बच्चों को मिठाई खिलाएं। इसके साथ ही मृत व्यक्ति के नाम से विधि-विधान से तर्पण कराना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार यदि मृत्यु के बाद बार-बार सपनों में आना किसी बात की ओर इशारा होता है। ऐसा माना जाता है कि यदि मरने वाले आत्मा अतृप्त है या उसकी कोई इच्छा अधूरी रह गई है या वह अशांत है तो संबंधित व्यक्ति के सपनों में आकर संकेत देती है। ऐसे में परिवार के सदस्यों को मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए पुण्य कर्म, दान आदि करना चाहिए। इससे वह आत्मा तृप्त होती है और उसे शांति प्राप्त होती है।
बेडरुम में भगवान की फोटो नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि...
हमारी धार्मिक मान्यताओं में एक यह भी है कि अपने शयनकक्ष यानी बेडरूम में भगवान की कोई प्रतिमा या तस्वीर नहीं लगाई जाती। केवल स्त्री के गर्भवती होने पर बालगोपाल की तस्वीर लगाने की छूट दी गई है। आखिर क्यों भगवान की तस्वीर अपने शयनकक्ष में नहीं लगाई जा सकती है? इन तस्वीरों से ऐसा क्या प्रभाव होता है कि इन्हें लगाने की मनाही की गई है?
वास्तव में यह हमारी मानसिकता को प्रभावित कर सकता है। इस कारण भगवान की तस्वीरों को मंदिर में ही लगाने को कहा गया है, बेडरूम में नहीं। चूंकि बेडरूम हमारी नितांत निजी जिंदगी का हिस्सा है जहां हम हमारे जीवनसाथी के साथ वक्त बिताते हैं। बेडरूम से ही हमारी सेक्स लाइफ भी जुड़ी होती है। अगर यहां भगवान की तस्वीर लगाई जाए तो हमारे मनोभावों में परिवर्तन आने की आशंका रहती है। यह भी संभव है कि हमारे भीतर वैराग्य जैसे भाव जाग जाएं और हम हमारे दाम्पत्य से विमुख हो जाएं। इससे हमारी सेक्स लाइफ भी प्रभावित हो सकती है और गृहस्थी में अशांति उत्पन्न हो सकती है। इस कारण भगवान की तस्वीरों को मंदिर में ही रखने की सलाह दी जाती है।
जब स्त्री गर्भवती होते है तो गर्भ में पल रहे बच्चे में अच्छे संस्कारों के लिए बेडरूम में बाल गोपाल की तस्वीर लगाई जाती है। ताकि उसे देखकर गर्भवती महिला के मन में अच्छे विचार आएं और वह किसी भी दुर्भावना, चिंता या परेशानी से दूर रहे। मां की अच्छी मानसिकता का असर बच्चे के विकास पर पड़ता है।
वास्तव में यह हमारी मानसिकता को प्रभावित कर सकता है। इस कारण भगवान की तस्वीरों को मंदिर में ही लगाने को कहा गया है, बेडरूम में नहीं। चूंकि बेडरूम हमारी नितांत निजी जिंदगी का हिस्सा है जहां हम हमारे जीवनसाथी के साथ वक्त बिताते हैं। बेडरूम से ही हमारी सेक्स लाइफ भी जुड़ी होती है। अगर यहां भगवान की तस्वीर लगाई जाए तो हमारे मनोभावों में परिवर्तन आने की आशंका रहती है। यह भी संभव है कि हमारे भीतर वैराग्य जैसे भाव जाग जाएं और हम हमारे दाम्पत्य से विमुख हो जाएं। इससे हमारी सेक्स लाइफ भी प्रभावित हो सकती है और गृहस्थी में अशांति उत्पन्न हो सकती है। इस कारण भगवान की तस्वीरों को मंदिर में ही रखने की सलाह दी जाती है।
जब स्त्री गर्भवती होते है तो गर्भ में पल रहे बच्चे में अच्छे संस्कारों के लिए बेडरूम में बाल गोपाल की तस्वीर लगाई जाती है। ताकि उसे देखकर गर्भवती महिला के मन में अच्छे विचार आएं और वह किसी भी दुर्भावना, चिंता या परेशानी से दूर रहे। मां की अच्छी मानसिकता का असर बच्चे के विकास पर पड़ता है।
Wednesday, 30 November 2011
अपने कम्प्यूटर पर दौड़ते हुए घोड़े का वालपेपर लगाएं, क्योंकि...
क्या आप जानते हैं आपके कम्प्यूटर का वालपेपर आपके कार्य को प्रभावित करता है। यदि आप चाहते हैं कि आप अपने कार्य में एकदम परफेक्ट हो और कार्य फटाफट कम्प्लीट हो जाए। तो अपने डेस्कटॉप पर दौड़ते हुए घोड़े का फोटो लगाएं।
यदि आपके डेस्कटॉप पर दौड़ते हुए घोड़े का फोटो होगा तो सच मानिए आपके कार्य में तेजी आएगी। घोड़ा हमेशा से ऊर्जा का प्रतीक रहा है। इसे देखकर कार्य में ध्यान लगता है और ऊर्जा मिलती है। यदि आपको अक्सर नकारात्मक विचारों से जुझना पड़ता है तो यह फोटो आपके विचारों पर भी अच्छा प्रभाव डालेगा।
शास्त्रों के अनुसार घोड़े को शक्ति का पर्याय माना गया है। ये एक ऐसा जीव है जो स्वस्थ होने पर जीवन में कभी भी बैठता नहीं है। घोड़ा कभी थकता भी नहीं है। इसी वजह से जहां घोड़ा या घोड़े का फोटो भी रहता है तो वहां का वातावरण भी ऊर्जा से भरपूर हो जाता है।
कम्प्यूटर के अतिरिक्त यदि आप ऑफिस में दौड़ते हुए घोड़े का बड़ा फोटो लगाएंगे तो इसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे। आप अपना कार्य पूरी तन्मयता के साथ कर पाएंगे। सफलता आपके कदम चूमेगी।
यदि आपके डेस्कटॉप पर दौड़ते हुए घोड़े का फोटो होगा तो सच मानिए आपके कार्य में तेजी आएगी। घोड़ा हमेशा से ऊर्जा का प्रतीक रहा है। इसे देखकर कार्य में ध्यान लगता है और ऊर्जा मिलती है। यदि आपको अक्सर नकारात्मक विचारों से जुझना पड़ता है तो यह फोटो आपके विचारों पर भी अच्छा प्रभाव डालेगा।
शास्त्रों के अनुसार घोड़े को शक्ति का पर्याय माना गया है। ये एक ऐसा जीव है जो स्वस्थ होने पर जीवन में कभी भी बैठता नहीं है। घोड़ा कभी थकता भी नहीं है। इसी वजह से जहां घोड़ा या घोड़े का फोटो भी रहता है तो वहां का वातावरण भी ऊर्जा से भरपूर हो जाता है।
कम्प्यूटर के अतिरिक्त यदि आप ऑफिस में दौड़ते हुए घोड़े का बड़ा फोटो लगाएंगे तो इसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे। आप अपना कार्य पूरी तन्मयता के साथ कर पाएंगे। सफलता आपके कदम चूमेगी।
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