Friday, 14 September 2012

शनैश्चरी अमावस्या = 15.9.12



* शनि अमावस्या

               शनि अमावस्या के दिन श्रीशनिदेव की आराधना करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. 15 सितम्बर 2012 को शनिवार के दिन शनि अमावस्या मनाई जानी है, यह पितृकार्य अमावस्या के रुप में भी जानी जाती है. कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी अनेक बाधाओं से मुक्ति पाने का यह दुर्लभ समय होता है जब शनिवार के दिन अमावस्या का समय हो जिस कारण इसे शनि अमावस्या (या शनीचरी अमावस्या या शनैश्चरी अमावस्या) कहा जाता है.

               श्री शनिदेव कर्मफल व्यवस्था में दंडाधिकारी हैं. यदि निश्छल भाव से शनिदेव का नाम लिया जाये तो व्यक्ति के सभी कष्टों दूर हो जाते हैं. श्री शनिदेव तो इस चराचर जगत में कर्मफल दाता हैं जो व्यक्ति के कर्म के आधार पर उसके भाग्य का फैसला करते हैं. इस दिन शनिदेव का पूजन सफलता प्राप्त करने एवं दुष्परिणामों से छुटकारा पाने हेतु बहुत उत्तम होता है.

              शनैश्चरी अमावस्या पर शनिदेव का विधिवत पूजन कर सभी लोग पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं. शनिदेव क्रूर नहीं अपितु कल्याणकारी हैं. इस दिन विशेष अनुष्ठान द्वारा पितृदोष और कालसर्प दोषों से उत्पन्न कष्टों में भी न्यूनता लाई जा सकती है. इसके अलावा शनि का पूजन और तैलाभिषेक कर शनि की साढेसाती, ढैय्या और महादशा जनित कष्टों से भी मुक्ति पाई जा सकती है.


* शनि अमावस्या पितृदोष से मुक्ति में भी सहायक

              पितरों की तिथि होने के कारण अमावस्या का विशेष महत्व है और अमावस्या अगर शनिवार के दिन पड़े तो इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है. भविष्यपुराण के अनुसार शनैश्चरी अमावस्या शनिदेव को अधिक प्रिय रहती है. शनिदेव की कृपा का पात्र बनने के लिए शनैश्चरी अमावस्या को सभी को विधिवत आराधना करनी चाहिए.

              शनैश्चरी अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए. जिन व्यक्तियों की कुण्डली में पितृदोष या जो भी कोई पितृदोष की पीडा़ को भोग रहे होते हैं उन्हें इस दिन दान इत्यादि विशेष कर्म करने चाहिए. यदि पितरों का प्रकोप न हो तो भी इस दिन किया गया श्राद्ध आने वाले समय में मनुष्य को हर क्षेत्र में सफलता प्रदान करता है, क्योंकि शनिदेव की अनुकंपा से पितरों का उद्धार बडी सहजता से हो जाता है.


* शनि अमावस्या पूजन

               पवित्र नदी के जल से या नदी में स्नान कर शनिदेव का आवाहन कर अथवा मन्दिर में दर्शन कर, पूजन करना चाहिए. शनिदेव का नीले पुष्प, बेल पत्र, अक्षत अर्पण करें.
शनिदेव को प्रसन्न करने हेतु शनि मंत्र
ॐ शं शनैश्चराय नम:”,
अथवा
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नम:
का जाप करना चाहिए. इस दिन सरसों के तैल, उडद, काले तिल, कुलथी, गुड शनियंत्र और शनि संबंधी समस्त पूजन सामग्री को शनिदेव पर अर्पित करना चाहिए और शनि देव का तैलाभिषेक अवश्य करना चाहिए. शनि अमावस्या के दिन शनि मंत्र/स्तोत्र,  हनुमान चालीसा या संकटमोचन हनुमानाष्टक आदि के पाठ भी किए जा सकते हैं. जिनकी कुंडली या राशि पर शनि की साढ़ेसाती व ढैया का प्रभाव हो ऐसे जातकों को तो शनि अमावस्या के दिन पर शनिदेव का विधिवत पूजन अवश्य ही करना चाहिए.


* शनि अमावस्या महत्व
       
             ज्योतिषशास्त्र के अनुसार साढ़ेसाती एवं ढ़ैय्या के दौरान शनि व्यक्ति को अपना शुभाशुभ फल प्रदान करता है. शनि अमावस्या बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस दिन शनिदेव को प्रसन्न करके व्यक्ति शनि के कोप से अपना बचाव कर सकते हैं. पुराणों के अनुसार शनि अमावस्या के दिन शनिदेव को प्रसन्न करना बहुत आसान व विशेष होता है. शनि अमावस्या के दिन शनिदोष की शांति बहुत ही सरलता कर सकते हैं.

               इस दिन महाराज दशरथकृत या ऋषि पिप्पलादकृत शनिस्तोत्र का पाठ करके शनि की कोई भी वस्तु जैसे काला तिल, लोहे की वस्तुएँ, काला चना, कंबल, नीला फूल दान आपको शनिकृत कष्टों से बचाए रखते हैं. जो लोग इस दिन यात्रा में जा रहे हैं और उनके पास समय की कमी है वह सफर में शनिमंत्र अथवा “कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम:। सौरी: शनिश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।” मंत्र का जप करने का प्रयास अवश्य करें.


                                          || ॐ शं शनैश्चराय नम: ||


                                                                                    ''वशिष्ठ''
                                                                 www.facebook.com/AbhinavJyotisha

Tuesday, 11 September 2012

पुरुषोत्तम मास- कृष्णपक्ष एकादशी - परमा एकादशी = 12.09.12



कथा:‌-

अर्जुन बोले : हे जनार्दन ! आप अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम तथा उसके व्रत की विधि बतलाइये. इसमें किस देवता की पूजा की जाती है तथा इसके व्रत से क्या फल मिलता है?

श्रीकृष्ण बोले : हे पार्थ ! इस एकादशी का नाम ‘परमा’ है. इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को इस लोक में सुख तथा परलोक में मुक्ति मिलती है. भगवान विष्णु की धूप, दीप, नैवेध, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए. महर्षियों के साथ इस एकादशी की जो मनोहर कथा काम्पिल्य नगरी में हुई थी, कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो :

काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था. उसकी स्त्री अत्यन्त पवित्र तथा पतिव्रता थी. पूर्व के किसी पाप के कारण यह दम्पति अत्यन्त दरिद्र था. उस ब्राह्मण की पत्नी अपने पति की सेवा करती रहती थी तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी.

एक दिन सुमेधा अपनी पत्नी से बोला: ‘हे प्रिये ! गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती इसलिए मैं परदेश जाकर कुछ उद्योग करुँ’

उसकी पत्नी बोली: ‘हे प्राणनाथ ! पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नी को वही करना चाहिए. मनुष्य को पूर्वजन्म के कर्मों का फल मिलता है. विधाता ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, वह टाले से भी नहीं टलता. हे प्राणनाथ ! आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, जो भाग्य में होगा, वह यहीं मिल जायेगा’

पत्नी की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया. एक समय ऋषि कौण्डिन्य उस जगह आये. उन्हें देखकर सुमेधा और उसकी पत्नी ने उन्हें प्रणाम किया और बोले: ‘आज हम धन्य हुए. आपके दर्शन से हमारा जीवन सफल हुआ’ ऋषि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया.

भोजन के पश्चात् पतिव्रता बोली: ‘हे मुनिवर ! मेरे भाग्य से आप आ गये हैं. मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है. आप हमारी दरिद्रता नष्ट करने के लिए उपाय बतायें’

इस पर ऋषि कौण्डिन्य बोले : ‘अधिक मास’ (पुरुषोत्तम मास) की कृष्णपक्ष की ‘परमा एकादशी’ के व्रत से समस्त पाप, दु:ख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं. जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह धनवान हो जाता है. इस व्रत में कीर्तन भजन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए. महादेवजी ने कुबेर को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया है.’

फिर ऋषि कौण्डिन्य ने उन्हें ‘परमा एकादशी’ के व्रत की विधि कह सुनायी. ऋषि बोले: ‘हे ब्राह्मणी ! इस दिन प्रात: काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर विधिपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए. जो मनुष्य पाँच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं, वे अपने माता पिता और स्त्रीसहित स्वर्गलोक को जाते हैं. हे ब्राह्मणी ! तुम अपने पति के साथ इसी व्रत को करो. इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अन्त में स्वर्ग की प्राप्ति होगी’

ऋषि के कहे अनुसार उन्होंने ‘परमा एकादशी’ का पाँच दिन तक व्रत किया. व्रत समाप्त होने पर ब्राह्मण की पत्नी ने एक राजकुमार को अपने यहाँ आते हुए देखा. राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से उन्हें आजीविका के लिए एक गाँव और एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था, रहने के लिए दिया. दोनों इस व्रत के प्रभाव से इस लोक में अनन्त सुख भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को गये.

हे पार्थ ! जो मनुष्य ‘परमा एकादशी’ का व्रत करता है, उसे समस्त तीर्थों व यज्ञों आदि का फल मिलता है. जिस प्रकार संसार में चार पैरवालों में गौ, देवताओं में इन्द्रराज श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार मासों में अधिक मास उत्तम है. इस मास में पंचरात्रि अत्यन्त पुण्य देनेवाली है. इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और पुण्यमय लोकों की प्राप्ति होती है.

                                                 || ॐ नमो नारायणाय ||

                                                                                                 ''वशिष्ठ''
                                                                          www.facebook.com/AbhinavJyotisha

Friday, 7 September 2012

* भाग्यवर्धक वस्तुएँ *


आज हम आपको कुछ भाग्यवर्धक वस्तुओं के बारे में बता रहे हैं जिनके प्रयोग करने से आप स्वयं अपने घर-द़फ्तर आदि के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि कर सकते हैं.

1. रुद्राक्ष
2. शंख
3. घंटी
4. स्वस्तिक का चिह्न
5. ॐ का लॉकेट
6. सूर्य की मुखाकृति
7. कलश
8. गंगाजल
9. मौली (कलाई पर बंधने वाला धागा)
10. कमल गट्टे, तुलसी या रुद्राक्ष की माला
11. प्रकृति या प्रेरक व्यक्ति का चित्र।

आगे कुछ और ऐसी ही वस्तुओं के बारे में...

Thursday, 30 August 2012

भाद्रपद अधिक मास पूर्णिमा : 31.08.2012


               इस वर्ष 2012 में भाद्रपद माह में अधिकमास पड़ रहा है. इस माह की पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है. इस माह में आने वाली पूर्णिमा के दिन स्नानादि कर्म से निवृत होकर भगवान सूर्यनारायण का पुष्प, अक्षत तथा लाल चंदन से पूजन करें. फिर शुद्ध घी, गेहूँ और गुड. के मिश्रण से पूए बनाने चाहियें तथा फल, वस्त्र, मिष्ठान और दक्षिणा समेत दान करना चाहिए. आप यह दान अपनी सामर्थ्यानुसार ही करें. दान करते समय निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए.

“ऊँ विष्णु रूप: सहस्त्रांशु सर्वपाप प्रणाशन:। अपूपान्न प्रदानेन मम पापं व्यपोहतु।।”

इस मंत्र के बाद भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हुए निम्न मंत्र बोलें :-

“यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुड़ोयस्य वाहनम । शंख करतले यस्य स मे विष्णु: प्रसीदतु ।।”

*$*  भाद्रपद अधिक मास पूर्णिमा पूजा -
--------------------------------------
               साधारणतः भाद्रपद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा भाद्रपद नक्षत्र में रहता है लेकिन चूँकि इस बार अधिकमास है अत: चन्द्रमा भाद्रपद नक्षत्र में ना होकर शतभिषा में रहेगा. पूर्णिमा को प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, पोखर, कुआं या घर पर ही स्नान करके भगवानविष्णु की पूजा करनी चाहिए. भाद्रपद मास में ब्राह्मण को भोजन कराना, दक्षिणा देना तथा पितरों का तर्पण करना चाहिए. भाद्रपूर्णिमा के दिन गंगास्नान करने वाले पर भगवान विष्णु की असीम कृपा रहती है. इस वर्ष भाद्रपद मास अधिकमास होने के कारण इस पूर्णिमा का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है इस समय व्रत एवं पूजा पाठ द्वारा व्यक्ति को सुख-सौभाग्य, धन-संतान की प्राप्ति होती है.

               भाद्रपद अधिक मास पूर्णिमा के अवसर पर भगवान सत्यनारायणजी की कथा की जाती है. भगवान विष्णु की पूजा में केले के पत्ते व फल, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा का उपयोग किया जाता है. इसके साथ ही साथ गेहूँ के आटे को भून कर उसमें चीनी मिलाकर पंजीरी का प्रसाद बनाया जाता है और इस का भोग लगाया जाता है.

               इसके बाद सुविधानुसार देवीलक्ष्मी, महादेव और ब्रह्माजी का पूजन भी किया जाता है, मतांतर से अन्य देव-देवियों के पूजन की भी परंपरा है. विष्णु पूजन में चरणामृत का विशेष महत्व है अतः चरणामृत प्रसाद सभी को लेना चाहिए.

*$*  अधिक मास पूर्णिमा व्रत का महत्व -
-----------------------------------------
               जो व्यक्ति अधिकमास में पूर्णिमा के व्रत का पालन करते हैं, उन्हें भूमि पर ही सोना चाहिए. एक समय केवल सादा तथा सात्विक भोजन करना चाहिए. इस दिन व्रत रखते हुए भगवान पुरुषोत्तम अर्थात विष्णुजी का श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहिए तथा मंत्र जाप करना चाहिए. श्रीपुरुषोत्तम माहात्म्य की कथा का पठन अथवा श्रवण भी किया जा सकता है. श्रीमद्रामचरितमानस का पाठ या रुद्राभिषेक का पाठ भी किया या करवाया जा सकता है, साथ ही किसी भी विष्णुस्तोत्र का पाठ करना भी शुभ होता है. अधिकमास पूर्णिमा के दिन श्रद्धा भक्ति से व्रत तथा उपवास रखना चाहिए. इस दिन पूजा-पाठ का अत्यधिक माहात्म्य माना गया है. अधिकमास के पुण्यों को लोकोत्तर गतिके लिए अत्यन्त शुभ बताया गया है.
.
.
ॐ नमो नारायणाय ||
.
''वशिष्ठ''
www.facebook.com/AbhinavJyotisha
....

Sunday, 26 August 2012

कमला (पुरुषोत्तमी) एकादशी



              कमला एकादशी (पुरुषोत्तम मास की शुक्लपक्ष एकादशी) व्रत, पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) में करने का विधान है।

       ***   कथा इस प्रकार है- एक समय सत्यव्रती पांडुनंदन धर्मराज युधिष्ठिर ने गोपिका बल्लभ, चितचोर, जगत् नियंता भगवान श्रीकृष्ण से सादर पूछा- ‘हे भगवन्। मैं पुरुषोत्तम मास की एकादशी कथा का कर्णेंद्रिय पुटों से पान करना चाहता हूं। उसका क्या फल है? उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है? उसका विधान क्या है? कृपा करके बतलाइए।’

              भगवान श्री कृष्ण बोले- ‘राजेंद्र ! पापों का हरण करने वाली, व्रती मनुष्यों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली अधिक मास की शुक्ल पक्ष की कमला एकादशी व्रत में दशमी को व्रती शुद्ध चित्त हो दिन के आठवें भाग में सूर्य का प्रकाश रहने पर भोजन करे। रात्रि में भोजन ग्रहण न करे। बुरे व्यसनों का परित्याग करता हुआ, भगवत् चिंतन में लीन रहकर रात्रि को व्यतीत करे। प्रातःकाल अरुणोदय बेला में शय्या का त्यागकर नित्य नैमित्तिक क्रियाओं से निवृत्त हो एकादशी व्रत का संकल्प ले, कि हे पुरुषोत्तम भगवान। मैं एकादशी को निराहार रहकर द्वितीय दिवस में भोजन करूंगा, मेरे आप ही रक्षक हैं। ऐसी प्रार्थना कर भगवान का षोडशोपचार पूजन करे, मंत्रों का जप करे। घर पर जप करने का एक गुना, नदी के तट पर दोगुना, गौशाला में सहस्र गुना, अग्निहोत्र गृह में एक हजार एक सौ गुना, तीर्थ क्षेत्रों में, देवताओं के निकट तथा तुलसी के समीप लाख गुना और भगवान विष्णु व शिव के निकट अनंत गुना फल मिलता है।’

               भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः कहा-‘राजन्! अवंतिपुरी में शिवशर्मा नामक एक पुण्यात्मा, धर्मात्मा, भगवद्भक्त, ज्ञानी, श्रेष्ठ ब्राह्मण निवास करते थे। उनके पांच पुत्र थे। इनमें जो सबसे छोटा पुत्र था, स्वकीय दोष के कारण पापाचारी हो गया, इसलिए पिता तथा कुटुंबीजनों ने उसे त्याग दिया। अपने असत् कर्मों के कारण निर्वासित होकर वह बहुत दूर घने वन में चला गया। दैवयोग से एक दिन वह तीर्थराज प्रयाग में जा पहुंचा। क्षुधा से पीड़ित दुर्बल शरीर और दीन मुख वाले उस पापी ने त्रिवेणी में स्नान कर भोजन की तलाश में इधर-उधर भ्रमण करते हुए हरिमित्र मुनि का उत्तम आश्रम देखा। वह आश्रम विभिन्न प्रकार के वृक्षों, लताओं, पताकाओं आदि से परिपूर्ण था। बड़े ही सुंदर एवं स्वादिष्ट फल वृक्षों पर लगे हुए थे तथा अनेक प्रकार के एवं विभिन्न रंगों के पक्षी उन पर कलरव कर रहे थे। पुरुषोत्तम मास में वहां बहुत से, संत महात्मा, नर-नारी, बाल-वृद्ध आदि एकत्रित हुए थे। आश्रम पर पापनाशक कथा कहने वाले ब्राह्मणों के मुख से उसने श्रद्धापूर्वक कमला एकादशी कथा की महिमा सुनी, जो परम मंगलमयी, पुण्यमयी तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है। जयशर्मा नामक ब्राह्मण ने विधिपूर्वक कमला एकादशी की कथा सुनकर उन सबके साथ मुनि के आश्रम पर ही व्रत किया। जब आधी रात हुई तो सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली, भगवती लक्ष्मी उसके पास आकर बोलीं- ‘ब्राह्मण ! इस समय कमला एकादशी के व्रत के प्रभाव से मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं और देवाधिदेव श्रीहरि की आज्ञा पाकर वैकुंठ धाम से आई हूँ। मैं तुम्हें वर दूंगी।’ ब्राह्मण बोला - ‘माता लक्ष्मी ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो वह व्रत बताइये, जिसकी कथा-वार्ता में साधु-ब्राह्मण सदा लीन रहते हैं।’ मां लक्ष्मी ने कहा- ‘ब्राह्मण ! एकादशी व्रत का माहात्म्य श्रोताओं के सुनने योग्य सर्वोत्तम विषय है। इससे दुःस्वप्न का नाश तथा पुण्य की प्राप्ति होती है, अतः इसका यत्नपूर्वक श्रवण करना चाहिए। उत्तम पुरुष श्रद्धा से युक्त हो एकादशी माहात्म्य के एक या आधे श्लोक का पाठ करने से भी करोड़ों महापातकों से तत्काल मुक्त हो जाता है, फिर संपूर्ण एकादशी माहात्म्य श्रवण का तो कहना ही क्या ! जैसे मासों में पुरुषोत्तम मास, पक्षियों में गरुड़ तथा नदियों में गंगा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार तिथियों में एकादशी तिथि श्रेष्ठ है। एकादशी व्रत के लोभ से ही समस्त देवता आज भी भारतवर्ष में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं। देवगण सदा ही रोग शोक से रहित भगवान नारायण का अर्चन पूजन करते हैं। जो लोग मेरे प्रभु भगवान पुरुषोत्तम के नाम का सदा भक्तिपूर्वक जप करते हैं, उनकी ब्रह्मा आदि देवता सर्वदा पूजा करते हैं। जो लोग श्रीनारायण हरि की पूजा में ही प्रवृत्त रहते हैं, वे कलियुग में धन्य हैं। यदि दिन में एकादशी और द्वादशी हो तथा रात्रि बीतते-बीतते सूर्योदय से पूर्व ही त्रयोदशी आ जाए तो उस त्रयोदशी के पारण में सौ यज्ञों का फल प्राप्त होता है। व्रती मनुष्य सुदर्शन चक्र धारी देवाधिदेव श्री विष्णु के समक्ष भक्ति भाव से संतुष्ट चित्त होकर यह संकल्प ले कि ‘हे कमलनयन ! भगवान केशव! मैं एकादशी को निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूंगा। आप मुझे आश्रय प्रदान करें।’ यह प्रार्थना कर मन और इंद्रियों को वश में करके गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण-पाठ आदि के द्वारा रात्रि में भगवान के समक्ष जागरण करे। फिर द्वादशी के दिन स्नानोपरांत जितेंद्रियभाव से विधिपूर्वक श्रीविष्णु की पूजा करे। पूजनोपरांत भगवान से प्रार्थना करे- अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव।
प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञान दृष्टि प्रदो भव।।
‘केशव ! मैं अज्ञान रूप रतौंधी से अंधा हो गया हूं। आप इस व्रत से प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।’
इस प्रकार देवताओं के स्वामी जगदाधार भगवान गदाधर से प्रार्थना करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन एवं बलिवैश्वदेव की विधि से पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान करके वस्त्राभूषण द्रव्य दक्षिणादि से ब्राह्मणों का सम्मान कर आदर सहित विदाकर स्वयं भी मौन हो अपने बंधु-बांधवों के साथ प्रसाद ग्रहण करे। इस प्रकार जो शुद्ध भाव से पुण्यमयी एकादशी का व्रत करता है, वह पुनरावृत्ति से रहित श्रीहरि के वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।’

               भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- -‘राजन् ! ऐसा कहकर लक्ष्मी देवी उस ब्राह्मण को वरदान दे अंतर्धान हो गईं। फिर वह ब्राह्मण भी धनी होकर पिता के घर पर आ गया। पिता के घर पर संपूर्ण भोगों को प्राप्त होता हुआ वह ब्राह्मण भी अंत में भगवान के गोलोक धाम को प्राप्त हो गया। इस प्रकार जो कमला एकादशी का उत्तम व्रत करता है तथा इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह संपूर्ण पापों से मुक्त हो धर्म-अर्थ-काम मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेता है।
.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
.
त्वदीय वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ||
.
''वशिष्ठ''
....

Tuesday, 21 August 2012

* क्यों होता है अधिक मास ?


               लगभग समस्त भारतीय पंचांगों के अनुसार जो कि मुख्यतः सूर्य सिद्धांत पर आधारित होते हैं एक सौर वर्ष में 12 चांद्र मास होते हैं। परंतु जिस वर्ष अधिक मास होता है, उस वर्ष 12के स्थान पर 13 चांद्र मास होते हैं। यह लगभग ढाई वर्ष के अंतर में होता है तथा इस अतिरिक्त मास को ही अधिक मास कहा जाता है। अधिक मास क्यों होता है, आईये, इस बारे में विस्तार से चर
्चा करते हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार इस वर्ष दो भाद्रपद मास है। इनका आरंभ 3 अगस्त को होगा तथा समाप्ति 30 सितंबर को होगी। अधिक भाद्रपद मास का आरंभ प्रथम भाद्रपद मास के द्वितीय पक्ष से होगा तथा यह द्वितीय भाद्रपद मास के प्रथम पक्ष के अंत तक रहेगा। प्रथम भाद्रपद का प्रथम पक्ष तथा द्वितीय भाद्रपद मास का द्वितीय पक्ष शुद्ध भाद्रपद मास होगा। अतः अधिक भाद्रपद मास का आरंभ 18 अगसत 2012 से होकर 16 सितंबर 2012 को समाप्त होगा। 3 अगस्त से 17 अगस्त तक तथा 17 सितंबर से 30 सितंबर तक शुद्ध भाद्रपद मास होंगे। 


              भारतीय पंचांग के पांच अंगो तिथि, नक्षत्र, योग, करण एवं वार इनकी गणना मुख्यतः नभचक्र में सूर्य एवं चंद्रमा की स्थिति के आधार पर की जाती है। भारतीय पंचांग भू-केंद्रित खगोलिय गणनाओं के आधार पर निर्मित किये जाते हैं। इसमें पृथ्वी को केंद्र मानकर नभचक्र में स्थित अन्य सभी ग्रहों की गति की गणना की जाती है। इस गणना पद्धति में पृथ्वी को स्थिर मानकर सूर्य एवं चंद्रमा सहित अन्य सभी ग्रहों को सापेक्ष गति के आधार पर चलायमान किया जाता है। मेष राशि में सूर्य- मेष सौर मास, और वृष राशि में तो वृष सौर मास आदि। सूर्य जिस दिन एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उस दिन को ''सूर्य संक्रांति दिवस'' कहा जाता हैं इस प्रकार एक सौर वर्ष में 12 सौर मास एवं 12 सूर्य संक्रांतियां होती है। इन संक्रांतियों का नाम भी सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी के आधार पर रखा जाता है। जैसे मेष संक्रांति, वृष संक्रांति, मिथुन संक्रांति आदि। एक सौर वर्ष में चंद्रमा पृथ्वी की 12 परिक्रमाएं पूरी करता है। पृथ्वी की एक परिक्रमा करते समय चंद्रमा सूर्य के साथ एक बार संयुक्ति करता है तथा एक बार 180 का कोण बनता है। अर्थात एक सौर मास में या एक राशि में सूर्य एवं चंद्रमा वर्ष में केवल एक बार ही संयुक्ति करते हैं तथा एक बार ही 180 का कोण बनाते हैं। सूर्य एवं चंद्रमा के संयुक्ति काल को अमावस्या कहा जाता है। चंद्र मास एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक होता है (अमावस्यान्त) अथवा दूसरे सिद्धांत से पू्र्णिमा से पू्र्णिमा तक (पूर्णिमांत)। सूर्य एवं चंद्र एक दूसरे से 180 का कोण बनाते हैं तब पूर्णमासी होती है जो कि अमावस्या के ठीक 15 दिन पश्चात होती है। पूर्णमासी के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में विचरण करता है उसी के आधार पर उस चंद्रमास का नाम रखा गया है। चित्रा नक्षत्र में चंद्रमा होने पर चैत्र मास, विशाखा से वैशाख। ज्येष्ठा से ज्येष्ठ आदि। एक चंद्र मास में सूर्य एक बार राशि परिवर्तन करता है अर्थात एक सौर मास में जिस प्रकार एक अमावस्या एवं एक पूर्णमासी होती है। उसी प्रकार एक चंद्र मास में एक संक्रांति होती है। एक चंद्रमास - 29 दिवस 12 घंटे 44 मिनट एवं 3 सैकेंड का होता है। एक चंद्र वर्ष 354 दिवस 8 घंटे 48 मिनट एवं 36 सेकेंड का होता है। एक सौर वर्ष - 365 दिवस का होता है। इस प्रकार एक सौर वर्ष एवं एक चंद्र वर्ष में लगभग 11 दिवस का अंतर होता है। ढाई से तीन वर्ष में यह अंतर एक चंद्र मास के बराबर हो जाता है इस कारण प्रत्येक ढाई से तीन वर्ष के अंतराल में एक अधिक मास होता है। इसे दूसरी तरह से भी देखा जा सकता है- 60 सौर माह = 5 वर्ष = 62 चंद्र मास, इसी कारण प्रत्येक ढाई वर्ष के पश्चात एक अतिरिक्त चंद्र मास होता है और यही ''अधिक मास'' कहलाता है। अधिक मास तब होता है जब एक सौर मास में एक की अपेक्षा दो अमावस्याएं हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में पहली अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक की अवधि अधिक मास होता है। क्योंकि इस मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती है। तथा उस सौर मास में होने वाली दूसरी अमावस्या से इसी चंद्र मास की पुनरावृत्ति होती है और उस वर्ष में 12 के स्थान पर 13 चंद्र मास हो जाते हैं। पहली अमावस्या राशि के आरंभिक एक या दो अंशों पर होती है तथा दूसरी अमावस्या राशि के अंतिम अंशों के आस-पास होती है या सूर्य के राशि परिवर्तन के समय या सूर्य संक्रांति के समय या उसके एक या दो दिन के अंतर मे होती है। इस प्रकार प्रत्येक चंद्र मास में एक संक्रांति अवश्य होती है तथा एक सौर मास में एक पूर्णमासी एवं एक अमावस्या अवश्य होती है। परंतु अधिक मास में सूर्यसंक्रांति नहीं होती है, इसलिए इसे शुद्ध मास नहीं माना जाता है। इस प्रकार सौर वर्ष एवं चंद्र वर्ष की समयावधि अंतर के कारण प्रत्येक ढाई से तीन वर्ष के अंतराल में एक अधिक चंद्र मास होता है। अर्थात प्रत्येक ढाई से तीन वर्ष के अंतराल में एक सौर वर्ष में 12वे स्थान पर 13 चंद्र मास होते हैं। जिस सौर मास में एक के स्थान पर दो अमावस्या होती है उसी सौर मास में अधिक मास आता है तथा अधिक मास का नाम उस सौर मास में पड़ने वाले चंद्र मास के आधार पर ही होता है, जैसे इस बार भाद्रपद नक्षत्र (पूर्वा व उत्तरा) से भाद्रपद मास |
.
.
कुछ और जानकारी अगले लेख में...
.
.

Thursday, 16 August 2012

* कुशाग्रहणी अमावस्या - 17.08.12 *



               कुशाग्रहणी अमावस्या भाद्रपद कृष्ण पक्ष अमावस्या के दिन मनाई जाती है. इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा जाता है.

* कुशाग्रहणी अमावस्या विधि-विधान
              कुशाग्रहणी/कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन साल भर के धार्मिक कृत्यों के लिये कुश/कुशा एकत्र कर लेते हैं. प्रत्येक धार्मिक कार्य के लिए कुशा का इस्तेमाल किया जाता है. शास्त्रों में भी दस तरह की कुशा का वर्णन प्राप्त होता है.
यथा- कुशाः काशा यवा दूर्वा उशीराश्च सकुंदकाः |
गोधूमा ब्राह्मयो मौञ्जा दश दर्भाः सबल्वजाः ||

             जिस कुशा का मूल सुतीक्ष्ण हो, इसमें सात पत्ती हो, कोई भाग कटा न हो, पूर्ण हरा हो, तो वह कुशा देवताओं तथा पितृ दोनों कृत्यों के लिए उचित मानी जाती है.
कुशा तोड़ते समय ""विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज | नुद सर्वाणि पापानि दर्भा स्वस्तिकरो भव || हूं फट्"" मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.

             इससे पूर्व अघोरा चतुर्दशी के दिन भी तर्पण कार्य भी किए जाते हैं मान्यता है कि इस दिन शिव के गणों भूत-प्रेत आदि सभी को स्वतंत्रता प्राप्त होती है. हिमाचल आदि पहाड़ी प्रदेशों के ग्रामीण क्षेत्रों में परिजनों को बुरी आत्माओं के प्रभाव से बचाने के लिए लोग घरों के दरवाजे व खिड़कियों पर कांटेदार झाडिय़ों को लगाते हैं यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

* कुशाग्रहणी अमावस्या का महत्व
             शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है. इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का महत्व है. जब अमावस्या के दिन सोम, मंगलवार और गुरुवार के साथ जब अनुराधा, विशाखा और स्वाति नक्षत्र का योग बनता है, तो यह बहुत पवित्र योग माना गया है. इसी तरह शनिवार, और चतुर्दशी का योग भी विशेष फल देने वाला माना जाता है. शास्त्रोक्त विधि के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष में चलने वाला पन्द्रह दिनों के पितृ पक्ष का शुभारम्भ भादों मास की अमावस्या से ही हो जाता है.

* कुशाग्रहणी अमावस्या फल
             कुशाग्रहणी अमावस्या के दिन तीर्थ, स्नान, जप, तप और व्रत के पुण्य से ऋण और पापों से छुटकारा मिलता है. इसलिए यह संयम, साधना और तप के लिए श्रेष्ठ दिन माना जाता है. पुराणों में अमावस्या को कुछ विशेष व्रतों के विधान है. भगवान विष्णु की आराधना की जाती है यह व्रत एक वर्ष तक किया जाता है. जिससे तन, मन और धन के कष्टों से मुक्ति मिलती है.


अभिनव शर्मा 'वशिष्ठ'
.
www.facebook.com/AbhinavJyotisha
www.facebook.com/AbhinavYog
....

Wednesday, 15 August 2012

प्रदोष व्रत क्या है ? प्रदोष व्रत विधि क्या है ?


* प्रदोष
                    प्रत्येक चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है. यह व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों को किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के लगभग 2 घण्टे 30 मिनट का समय प्रदोष काल के नाम से जाना जाता है. प्रदेशों व ऋतुओं के अनुसार यह बदलता रहता है. सामान्यत: सूर्यास्त से लेकर रात्रि आरम्भ तक के मध्य की अवधि को प्रदोष काल में लिया जा सकता है. इस व्रत की पूर्ण अवधि 21 वर्ष की है.

                    ऎसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है. जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए. यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है. इस व्रत में भगवान शिव का पूजन किया जाता है, जो आराधना करने वाले व्यक्तियों को गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति दिलाता है.

* प्रदोष व्रत की महिमा
                    शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दो गायों का दान देने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि "एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा, उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है."

* प्रदोष व्रत से मिलने वाले फल
                     अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है. जैसे-
सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है. सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है.
जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से ॠण व रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है.
बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है.
गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है.
शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिये किया जाता है.
अंत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए.
अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है.

* प्रदोष व्रत विधि
                      प्रदोष व्रत करने के लिये उपवसक को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए. नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्रीशिव का स्मरण करें व व्रत का सँकल्प करना चाहिये. इस व्रत में दिन में आहार नहीं लिया जाता है. पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किये जाते है. ईशान कोण की दिशा में किसी एकान्त स्थल को पूजा करने के लिये प्रयोग करना विशेष शुभ रहता है. पूजन स्थल को गंगाजल/गौमूत्र या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है. अब इस मंडप में पद्म पुष्प की आकृ्ति पांच रंगों का उपयोग करते हुए बनाई जाती है. प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिये कुशा(कुश) के आसन का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार पूजन क्रिया की तैयारियां कर उतर-पूर्व (ईशान) दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए. पूजन में भगवान शिव के मंत्र  "ऊँ नम: शिवाय" जाप करते हुए षोडशोपचार या पंचोपचार अथवा कम से कम जल का अर्ध्य देना चाहिए.

* प्रदोष व्रत समापन / उद्यापन करना
                      इस व्रत की पूर्ण अवधि 21 वर्ष है, अल्प करें तो 11 वर्ष या 5 वर्ष, जो ये भी ना कर सकें, वे कम से कम 26 त्रयोदशियों तक उपवास रखें, रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे "उद्यापन" के नाम से भी जाना जाता है. इस व्रत का उद्यापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है. उद्यापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है. भगवान शिव का सपरिवार विधिवत पूजन किया जाता है, इसके बाद हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है. हवन समाप्त होने के बाद भगवान शिव की महाआरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत में 23 ब्राह्मण जोडों को भोजन कराया जाता है तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है.


अभिनव शर्मा 'वशिष्ठ'
.
....

Thursday, 9 August 2012

*%* श्रीकृष्ण जन्माष्टमी *%*


               भगवान विष्णु के अवतार रूप में श्रीकृष्ण जी का अवतरण भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्ररूप में हुआ था. स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अलग-अलग ढंग से मनाते हैं. श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं व इसी प्रकार वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं. इस वर्ष जन्माष्टमी का त्यौहार 9 अगस्त 2012 को स्मार्तों का व्रत है और 10 अगस्त 2012 को वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाएगा.

* जन्माष्टमी पूजा विधि :-
--------------------------
              श्री कृष्ण जी की पूजा आराधना का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण कर देता है. इस दिन व्रत-उपवास करने का अपना विधान है. यह व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना जाता है. इस दिन उपवास रखें जाते हैं तथा कृष्ण भक्ति के गीतों का श्रवण किया जाता है. घर के पूजागृह तथा मंदिरों में श्रीकृष्ण-लीला की झांकियां सजाई जाती हैं. भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा श्रीशालिग्राम का पंचामृत, गंगा जाल, यमुना जल आदि से अभिषेक किया जाता है तथा भगवान श्री कृष्ण जी का षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है. भगवान का श्रृंगार करके उन्हें झूला झुलाया जाता है. मध्यरात्रि तक पूर्ण उपवास रखा जाता है. जन्माष्टमी की रात्रि में जागरण, कीर्तन किए जाते हैं व अर्धरात्रि के समय शंख तथा घंटों के नाद से श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव को संपन्न किया जाता है.

* छप्पन भोग :-
‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌------------------
              जन्माष्टमी के दिन दूध और दूध से बने व्यंजनों का सेवन किया जाता है. भगवान कृष्ण को दूध और मक्खन अति प्रिय था. अत: जन्माष्टमी के दिन खीर और पेडे़, माखन-मिस्री जैसे मीठे व्यंजन बनाए और खाए जाते हैं. जन्माष्टमी का व्रत, मध्य रात्रि को श्रीकृष्ण भगवान के जन्म के पश्चात भगवान के प्रसाद को ग्रहण करने के साथ ही पूर्ण होता है.

* मोहरात्रि :-
--------------
              श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि भी कहा गया है. इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से मुक्ति प्राप्त होती है. जन्माष्टमी का व्रत करने से महान्‌ पुण्य की प्राप्ति होती है.

सार रुप से श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव सम्पूर्ण विश्व को आनंद-मंगल का संदेश देता है.

* जन्माष्टमी महत्व :-
‌‌-----------‌‌‌‌------------
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥

             गीता की इस अवधारणा द्वारा भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि जब जब धर्म का नाश होता है तब तब मैं स्वयं इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ और अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करता हूँ. अत: जब असुर एवं राक्षसी प्रवृतियों द्वारा पाप का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर इन पापों का शमन करते हैं. भगवान विष्णु इन समस्त अवतारों में से एक महत्वपूर्ण अवतार श्रीकृष्ण का रहा. भगवान स्वयं जिस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, उस पवित्र तिथि को ही हम कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं. अतः हमें भी धर्म मार्ग का ही आश्रय लेना चाहिये |

आप सभी को शुभकामनाएँ...

अभिनव शर्मा "वशिष्ठ"

https://www.facebook.com/AbhinavJyotisha
https://www.facebook.com/AbhinavYog

Wednesday, 1 August 2012

*** रक्षाबंधन के पवित्र शुभ मुहूर्त और मंत्र ***



## रक्षाबंधन के वचन का इतिहास ## [ इतिहास के पन्नों से ]

## रक्षाबंधन के वचन का इतिहास ##
[ इतिहास के पन्नों से ]
------------------------------------------

रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस पर्व की शुरुआत बहुत पहले हुई थी। 

भारतीय संस्कृति में पौराणिक शास्त्रों, धर्मग्रंथों और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों ने रक्षाबंधन के कई उदाहरण हमारे सामने पेश किए हैं। जानिए रक्षा के वचन निभाने से संबंधित कुछ खास और महत्वपूर्ण जानकारी। 

*
 भगवान इंद्र अपना राज्य वृत्रासुर के हाथों गंवाने के बाद उसके खिलाफ युद्ध पर जाने वाले थे। भगवान बृहस्पति के कहने पर इंद्र की पत्नी शचि ने उन्हें राखी बांध कर संग्राम में विजय होने के साथ-साथ उनकी रक्षा की प्रार्थना की।

* शास्त्रों के मुताबिक शिशुपाल की मृत्यु के पश्चात्‌ जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त बह रहा था, उस समय पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने रक्तस्राव रोकने के लिए उनकी कलाई पर अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर बांध दिया।

द्रौपदी के इस स्नेह को देख भगवान कृष्ण ने हर पल उनकी रक्षा करने का वचन दिया। तब से लेकर जीवन पर्यंत उन्होंने उनकी रक्षा की।

* एक और वृत्तांत के अनुसार यमराज की बहन यमुना ने राखी बांध कर उन्हें अजरता और अमरता के वरदान से संपूर्ण किया था।

* इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि जब राजा सिकंदर और राजा पुरू के बीच घमासान जंग हुई तब सिकंदर की पत्नी द्वारा पुरू को बांधी गई राखी के वचन स्मरण हुए और उसने सिकंदर की जान बक्श दी।

* चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने राजा हुमायूं को अपनी सुरक्षा के लिए राखी भेजी थी किंतु बंगाल के खिलाफ संग्राम के चलते हुमायूं चित्तौड़ और कर्णावती को राजपूत रीति-रिवाज वाले जौहर में कुर्बान होने से नहीं बचा सके।

* 1905 में बंग भंग (बंगाल विभाजन) के समय रवींद्रनाथ टैगोर ने हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में राखी बांधकर शांति और अमल कायम करने की अपील की थी।

इस पर्व को सामुदायिक त्योहार बनाकर राष्ट्रवादी भावना को विभिन्न जाति और संप्रदाय के लोगों में बहाल करने का अनुरोध किया था, जिसका फल कुछ हद तक बंगाल में नजर आया था।

अभिनव वशिष्ठ.





https://www.facebook.com/AbhinavJyotisha

$$$ श्रावणी पर्व का महत्व $$$ [ क्या है श्रावणी पर्व का मूल स्वरूप ]

$$$ श्रावणी पर्व का महत्व $$$
[ क्या है श्रावणी पर्व का मूल स्वरूप ]
--------------------------------------
               भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही तिथि, पर्व और उपासना का विशेष महत्व रहा है। आधुनिक वैश्विक प्रगति में जहां हमारा देश नई-नई बुलंदियों को छू रहा है, वहीं अपनी प्राचीन मान्यताओं को भी बड़ी सहजता से संजोए हुए है। यद्यपि कुछ पर्वों के मनाने में कुछ आधुनिकता भी आ गई है लेकिन मूल तत्व से जुड़ाव नही टूटा है।

               हमारी सनातन वैदिक सामाजिक व्यवस्था में वर्णाश्रम धर्म का विशेष महत्व रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्ण व्यवस्थाओं में भारत का प्राचीन समाज आज की अपेक्षाकृत कहीं अधिक व्यवस्थित एवं अनुशासित था। वर्णव्यवस्था में विकारयुक्त भेद कुछ सदियों के बाद शुरू हुआ लेकिन अब वह प्रायः समाप्त मात्र है।

               चार वर्णों, चार पुरुषार्थों में विभक्त प्राचीन वैदिक व्यवस्था में भारतवर्ष में चार ही प्रमुख राष्ट्रीय पर्व हुआ करते थे, जिनमें प्रथम वर्ण ब्राह्मण द्वारा संयोजित श्रावणी रक्षाबंधन पर्व; जो राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति को पूंजीभूत करने का पर्व था। दूसरा विजया दशमी जो क्षत्रिय वर्ण द्वारा संयोजित राष्ट्र की सैन्य शक्ति को सुसज्जित करने का पर्व। तीसरा महालक्ष्मी पूजा दीपावली पर्व वैश्य वर्ण द्वारा राष्ट्र की अर्थशक्ति को व्यवस्थित करने का पर्व और चौथा होली शूद्रवर्ण के संयोजन में समग्र राष्ट्र की शक्ति को पूंजीभूत करने का समन्वयात्मक पर्व के रूप में प्रचलित था।

               चारों पर्व, चारों वर्णों की आध्यात्मिक शक्ति, सैन्य शक्ति, अर्थशक्ति एवं पुरुषार्थ प्रधान शक्तियों को राष्ट्र को सुदृढ़ करने के लिए समन्वयात्मक प्रयास ही इन पर्वों के प्रमुख उद्देश्य थे। इसी कारण अनेक बार विदेशी आक्रांताओं द्वारा देश को छिन्न-भिन्न करने के क्रूर प्रयासों के बाद भी हम आज विश्व के समक्ष अपनी अस्मिता को सुरक्षित रख सके हैं और भारतवर्ष के नवसृजन में सतत अग्रसर हैं।

               श्रावणी पर्व पर किए जाने वाले रक्षा विधान में वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाने वाला कलावा केवल तीन धागों का समूह ही नहीं है अपितु इसमें आत्मरक्षा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के तीनों सूत्र संकल्प बद्ध होते हैं। प्राचीन मान्यताओं से इस पर्व को मानने वाले श्रद्धालु इस दिन नदियों के जल में खड़े होकर विराट भारत की महान परंपराओं का स्मरण करते हुए संकल्प करते हैं जिसे "हेमाद्रि संकल्प" अर्थात्‌ हिमालय जैसा महान संकल्प का नाम दिया हुआ है।

               इसमें सर्वप्रथम मनुष्य को नाना प्रकार के पाप, दुराचरण और समाज विरुद्ध कर्मों से दूर रहने तथा उनके प्रायश्चित्‌ की बात कही है। इस संकल्प में प्राचीन भारत के वन प्रदेशों जैसे बद्रिकारण्य, दंडकारण्य, अरावलीवन, गुह्यरण्य, जंबुकारण्य, विंध्याचलवन, द्राक्षारण्य (अंगूर के वन), नहुषारण्य, काम्यकारण्य, द्वैतारण्य, नैमिषारण्य, अवन्तिवन आदि प्राचीन भारत के विराट एवं समृद्धशाली वन प्रदेशों का स्मरण किया जाता है।

               इसके बाद पर्वत मालाओं का जिसमें सुमेरूकूट (पर्वत), निषिधकूट, शुभ्रकूट, श्रीकूट, हेमकूट (हिमालय) रजकूट, चित्रकूट, किष्किन्धा, श्वेताद्रि, विंध्याचल, नीलगिरि, सह्याद्रि कश्मेरू आदि उन समस्त पर्वत श्रृंखलाओं को याद किया जाता है जिनमें से कुछ अब वर्तमान भारतवर्ष की सीमा से बाहर हैं।

               इसके बाद तीर्थ क्षेत्रों शिव-शक्ति उपासना स्थलों के साथ सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदी एवं गंगा, गोदावरी, सतलुज, गंडकी, तुंगभद्रा, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी आदि प्राचीन विराट भारत में प्रवाहित होने वाली पवित्र नदियों को संकल्प में पिरोया गया है।

ताकि हम अपनी प्राचीन अखंड विरासत का स्मरण कर वर्तमान में श्रावणी पर्व पर यह संकल्प लें कि भारत की सार्वभौमिक एकनिष्ठ, विश्वबंधुत्व की भावना हमें एकसूत्र में बंधने की प्रेरणा प्रदान करें तथा राष्ट्र में कोई भी विघटनकारी ताकत अपना सिर न उठा सकें। इस संकल्प के बाद वेद मंत्रों से अभिमंत्रित यज्ञोपवीत धारण कर हाथ की कलाई में रक्षासूत्र बांधा जाता है।

              कुछ सदियों से रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के स्नेह के पर्व के रूप में प्रसिद्ध हो गया है। इसे एक और नई उपलब्धि कहा जा सकता है क्योंकि भाई अपनी बहनों से राखी बंधवा कर उसे यह विश्वास दिलाते हैं कि इस पवित्र बंधन के माध्यम से वह तुम्हारी सदैव देखभाल करता रहेगा। चाहे कोई भी परिस्थिति, कैसी भी समस्या आ जाए, उसका भाई हमेशा उसकी रक्षा करेगा।

इस प्रकार यह पर्व भारत की विराट आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा का संकल्प दिवस बन गया है।

अभिनव वशिष्ठ.


Tuesday, 31 July 2012

* कैसे बनाएं घर को भाग्यवर्धक ?



1. घर हो वास्तु अनुसार।
2. घर का द्वार उत्तर, पश्चिम या पूर्व दिशा में हो।
3. घर सदा साफ-सुधरा रखें।
4. घर के भीतर अनावश्यक वस्तुएं नहीं रखें।
5. घर में ढेर सारे देवी और देवताओं के चित्र या मूर्तियां न रखें।
6. घर का ईशान कोण हमेशा खाली रखें या उसे जल का स्थान बनाएं।
7. दरवाजे के ऊपर भगवान गणेश का चित्र और दाएं-बाएं स्वस्तिक के साथ शुभ-लाभ लिखा हो।
8. घर में मधुर सुगंध और संगीत से वातावरण को अच्छा बनाएं। रात्रि में सोने से पहले घी में तर किया हुआ कपूर जला दें।

अभिनव वशिष्ठ.

.
www.facebook.com/AbhinavJyotisha
....

Thursday, 19 July 2012

शिवत्व के बिना सुंदरता मूल्यहीन

        
              मूल्यशास्त्र का महावाक्य है सत्यं शिवं सुन्दरं। मानव जीवन के यही तीन मूल्य हैं। जो सत्य है वही शिव है और जो शिव है वहीं सुंदर है। पश्चिम का सौंदर्यशास्त्री यह मानकर चलता है कि सुंदरता द्रष्टा की दृष्टि में है। यानी सौंदर्य बोध नितांत व्यक्तिनिष्ठ है। परंतु भारतीय मनीषा सुंदरता की इस परिभाषा को खारिज कर देती है। वह सत्य-शिव-सुन्दर को सर्वथा वस्तुनिष्ठ मानती है। मूल्य सापेक्ष न होकर निरपेक्ष हैं। मनुष्य इसलिए मनुष्य है, क्योंकि वह मूल्यों के अधीन है। मूल्य उसकी विशिष्ट संपत्ति है। सुन्दर क्या है? जो शिव है वही सुंदर है। अर्थात जिसमें शिवत्व नहीं है, उसमें सौंदर्य भी नहीं है।
यस्मिन् शिवत्वंनास्तितस्मिनसुन्दरंअपिनास्तिएव।


               हमारे मन को सुख देने वाली चीज सुंदर है-यह सुंदरता की बचकानी परिभाषा है। सुख और दु:ख संस्कारगत होने के नाते व्यक्तिनिष्ठ हैं। अनुकूल वेदना का नाम सुख है और प्रतिकूल वेदना का नाम दु:ख है। एक ही चीज किसी को सुख देती है और किसी को दु:ख। परंतु सुंदरता तो वस्तुनिष्ठ ही है। हमारा शास्त्र बोलता है कि जो कल्याणकारी है वही सुंदर है। यह जरूरी नहीं है कि सुखद चीज सुंदर भी हो।गीता कहती है कि भोग का सुख भ्रामक है और अंतत:दु:खवर्धक है।
ये हि संस्पर्शजाभोगा दु:खयोनयएवते।
ऐसा सुख भी होता है जो शुरू में अमृत जैसा लगता है, किंतु उसका परिणाम विषतुल्य होता है। यदि क्षणिक सौंदर्यबोध आगे चलकर दीर्घकालीन दु:ख का कारण बने तो वह कतई सुंदर नहीं है। कष्टकर होने के नाते वर्तमान में साधना भले ही असुंदर लगे, किंतु प्रगति में सहायक होने के नाते अंतत:वही सुन्दर है।
गीता भी कहती है: यत्तदग्रे विषामिवपरिणामेमृतोपमम्। यहाँ यह सवाल उठ सकता है कि जो कष्ट देने वाला है वह सुंदर कैसे हो सकता है? यदि कोई कष्टकर अभ्यास दीर्घकालीन सौन्दर्य का बोध कराने में समर्थ है तो वह तप है और इसलिए सुंदर है। प्रमादजनित सुख सुंदर हो ही नहीं सकता। चूंकि तप विकास में हेतु है, अत: सुन्दर है।

               इस प्रकार सुन्दरं की परिभाषा निश्चित हुई । यत् शिवंतत् सुन्दरम्। शिव का अर्थ है मंगल। मंगल शब्द मग् धातु से बना है, जिसका अर्थ है कल्याण। इस प्रकार शिव में उत्कर्ष है; विकास है; प्रगति है। शास्त्र बाहरी प्रगति का तिरस्कार नहीं करता है, अपितु सम्मान से उसे अभ्युदय कहता है। अशिक्षा से शिक्षा की ओर, दरिद्रता से समृद्धि की ओर, अपयश से यश की ओर, निस्तेज से तेजस्विता की ओर बढना प्रगति है। समृद्धि के पीछे कर्मकौशल होता है। प्रतिष्ठा किसी को उपहार में नहीं मिल जाती। विद्वान ही विद्वान के श्रम को जानता है: विद्वान जानाति विद्वज्जन परिश्रम:। श्रम तो स्वयं सुंदर है, क्योंकि वह तप है।भीतरी प्रगति का भी प्रस्थान बिंदु जीवन मूल्य है। जीवत्व से ब्रह्मत्व की ओर जाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। सत्व में स्थित होना प्रगति है; विनम्रता में अवस्थित होना प्रगति है; भक्ति में प्रतिष्ठित होना प्रगति है। शिवत्व का अर्थ ही है प्रगति या कल्याण। अत:यह मानकर चलें कि जो शिव है वही सुंदर है। यह जीवन दर्शन की प्रमाणित मंगलमयी कसौटी है।आखिर शिवं का हेतु क्या है। भारतीय ऋषि बोलता है सत्यं। वेदान्त की भाषा में सत्य-शिव-सुन्दर में हेतुफलात्मक सम्बंध है। इसका अर्थ हुआ: यत् सत्यं तत् शिवं,यत् शिवंतत् सुंदरं। शास्त्र को समझना हमारी बुद्धि की जिम्मेदारी है। शास्त्र को समझने के साथ-साथ उससे हमारे अनुभव का भी तालमेल बैठना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो काम बिगडने लगता है। गांधी जी की तरह हमें भी सत्य की गहराई में प्रवेश करना चाहिए। वह कहा करते थे कि सत्य को छोडने का मतलब है ईश्वर को छोडना। गांधी जी ने सत्य को केवल समझा ही नहीं, अपितु जीवन में उसका भरपूर प्रयोग भी किया। यही कारण है कि वह सत्यनिष्ठ से भी आगे प्रयोगनिष्ठ बन गए।

               रामायण और महाभारत हमारे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ हैं। जहां रामायण पारिवारिक सौहार्द का पर्याय है, वहीं महाभारत पारिवारिक कलह का। नीति को लेकर दोनों में अंतर है। नीति कहती है कि अपंग को राजा नहीं बनाया जा सकता। इसीलिए बडे भाई होने के बावजूद जन्मांध धृतराष्ट्र को राजा नहीं बनाया गया और पाण्डु को राजा बना दिया गया। बाद में धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का प्रतिनिधि बनाकर पाण्डु वन चले गए। इस सत्य को धृतराष्ट्र ने कभी नहीं स्वीकार किया और इसे अपने खिलाफ षड्यंत्र मानता रहा। यदि वे इस सत्य को स्वीकार कर लिए होते कि राजवंश पाण्डु का चलना चाहिए तो महाभारत होने का प्रश्न ही न उठता। धृतराष्ट्र शिवत्व की तलाश जीवनभर असत्य में करता रहा। उसकी इस उलटी चाल से कौरव वंश का नाश हो गया।इधर मर्यादा पुरुष भरत ने कभी भी सत्य को नहीं छोडा। उन्होंने भरी सभा में घोषणा की कि सब सम्पत्ति रघुपति कै आही और आगे विनम्रता दिखाते हुए कहा कि हित हमार सियपति सेवकाई। सर्वसम्मति से राजा घोषित होने के बाद भी श्रीराम के आदेश पर वे अयोध्या के प्रतिनिधि ही बने रहे। इस प्रकार भरत के सत्याग्रह से रामायण निकली और धृतराष्ट्र के असत्याग्रह से महाभारत। जिस सुंदरता से शिव न प्रकट हो वह छलावा है और जिस शिव से सत्य न प्रकट हो वह अमंगलकारी है।

अभिनव वशिष्ठ.
https://www.facebook.com/AbhinavJyotisha
https://www.facebook.com/AbhinavYog

Friday, 29 June 2012

संयम और सदाचार का प्रेरक चातुर्मास



               भारतीय संस्कृति में चातुर्मासका सदा से ही विशेष स्थान रहा है। सम्पूर्ण जगत् के पालक भगवान विष्णु के आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के योग-निद्राकाल को चातुर्मास कहा जाता है। यद्यपि गृहस्थोंके लिए चातुर्मासके नियम आषाढ शुक्ल द्वादशी से लागू हो जाते हैं तथापि संन्यासियों का चातुर्मास आषाढी पूर्णिमा से शुरू माना गया है। शास्त्रों में यहां तक लिखा है कि जो लोग द्वादशी से चातुर्मास का विधान प्रारंभ न कर सके हों, वे पूर्णिमा से उसका पालन करना अवश्य शुरू कर दें। जैन धर्म के अनुयायी चातुर्मासको आषाढ शुक्ल चतुर्दशी से कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक मानते हैं। वे इन दोनों तिथियों को चौमासी चौदस कहते हैं। सनातन धर्म में समस्त मांगलिक कार्यो के शुभारंभ में संकल्प भगवान विष्णु को साक्षी मानकर ही किए जाते हैं। अत: श्रीहरि के शयनकाल (चातुर्मास) में विवाह, मुण्डन, यज्ञोपवीत आदि सभी शुभ कार्य निषिद्ध बताए गए हैं।

                अब यह चातुर्मासशुरू होने जा रहा है। इसकी अवधि में किसी भी प्रिय वस्तु का परित्याग करके उसका दान देने से अनन्त पुण्यफल प्राप्त होता है। चातुर्मास में अलग-अलग वस्तुओं को त्यागने का भी एक पृथक् आध्यात्मिक लाभ मिलता है। पद्मपुराणमें भगवान शंकर का कथन है- चातुर्मासमें गुड का त्याग करने से मनुष्य को मधुरता प्राप्त होती है। तेल को त्याग देने से दीर्घायु संतान और इत्र को त्यागने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पान का त्याग करने से प्राणी भोग-सामग्री से सम्पन्न होता है। घी के त्याग से लावण्य मिलता है। फल को त्यागने से कुटुम्ब में वृद्धि होती है। चातुर्मास में अनार,नीबू और नारियल का त्याग करने वाला श्रीहरि का सामीप्य प्राप्त करता है। जो मनुष्य चौमासे में गेहूं, जौ और चावल को त्यागता है, उसे अनेक यज्ञों का फल प्राप्त होता है। जो व्यक्ति चौमासे में दूध, दही, गुड, साग और पत्र को छोड देता है, वह सद्गति का अधिकारी बनता है। भगवान हृषीकेशके शयन करने पर पत्तियों के साग, लौकी तथा सिले हुए वस्त्र को त्यागने वाला कभी नरक में नहीं जाता है। जिसने चौमासे में असत्य भाषण, क्रोध, शहद तथा पर्व के अवसर पर भोग- विलास को त्याग दिया, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलेगा। चौमासे में नमक को त्याग देने वाले के सभी कर्म सफल होते हैं। चातुर्मास में शय्या को त्यागकर भूमि पर शयन करना ही उचित रहता है।

               सामान्यत:चातुर्मास में लौकी, बैंगन, गाजर, मशरूम, मूली, लसोडा, कैथा, सेम, लम्बी फलियां, उडद, टमाटर, राजमा, लोबिया, परवल और अचार न खाने का निर्देश मिलता है। जो यह न कर सकें वे सावन में साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल त्याग दें। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में लीन होने के दिन से पाँच दिन तक उपवास रखकर छठे दिन भोजन करने वाला समस्त यज्ञों का फल प्राप्त करता है। चौमासे में जो सदा तीन रात उपवास करते हुए चौथे दिन सात्विक भोजन करता है, वह पुनर्जन्म नहीं लेता। जो चातुर्मास में अयाचित पदार्थो का सेवन करता है, उसका स्वजनों से कभी वियोग नहीं होता। उपवास करने में असमर्थ चातुर्मास में मात्र एक वक्त स्वल्पाहार ग्रहण करें।

               चातुर्मास में आत्म-संयम और ब्रह्मचर्य का भी विशेष महत्व है। जो वैष्णव श्रीहरि के शयनकाल में व्रत-परायण होकर संयम धारण करता है, वह अभीष्ट सिद्धि को पा लेता है। चौमासे में जो भक्त भगवान विष्णु के समक्ष प्रतिदिन पुरुषसूक्त का पाठ करता है, वह शीघ्र ही विद्वानों में श्रेष्ठ हो जाता है। जो अपने हाथ में फल लेकर श्रीहरि की नित्य 108 परिक्रमा करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। चातुर्मास में मौनव्रतधारण करने वाला देवत्व प्राप्त करता है। इस अवधि में ॐ नमो नारायणाय मंत्र या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप सौगुना अधिक फल प्रदान करता है। चौमासे में कांसे के बर्तनों का प्रयोग वर्जित है। चौमासे में पलाश के पत्तों में किया गया भोजन सब पातकों को नष्ट करके एकादशी-व्रत का पुण्यफल प्रदान करता है। चातुर्मास में तुलसीदल, तिल और कुशों से तर्पण करने पर कोटिगुना फल प्राप्त होता है। चौमासे में अपने हाथ से भोजन बनाकर खाने वाला इन्द्र के समान प्रभावशाली बन जाता है। श्रीहरिके मंदिर में संगीत-नृत्य से उत्सव करने वाला उनकी अनुकम्पा का भागी अवश्य बनता है।

               स्कन्दपुराण में चातुर्मास में पुरुषोत्तम क्षेत्र की यात्रा (जगन्नाथपुरी) का अतिशय माहात्म्य वर्णित है। पुरी में समुद्र-स्नान करके भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने वाला भगवत्कृपा का पात्र बन जाता है। पुरुषोत्तम क्षेत्र में मात्र एक दिन-रात ही निवास करने से अत्यन्त पुण्य प्राप्त होता है। चातुर्मासमें ब्रजमण्डल की तीर्थयात्रा अथवा ब्रज में वास करने से भी श्रीहरि प्रसन्न होते हैं। भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने पर समस्त तीर्थो का तेज जल में प्रविष्ट हो जाता है। अतएव किसी भी पवित्र नदी या जलाशय में नित्य स्नान करने से पाप धुलते हैं। शास्त्रों में वर्णित विधान का लाभ केवल सच्चा भक्त ही उठा सकता है। पाखण्डी और पापाचारी गलत कार्यो को छोडने पर ही लाभान्वित हो सकते हैं।

               चातुर्मास में जिस प्रिय वस्तु का परित्याग किया जाता है, उसका दान देने पर ही नियम पूर्ण होता है। वस्तुत:चातुर्मास में बनाए गए शास्त्रीय विधानों का मूल उद्देश्य मनुष्य को त्याग और संयम की शिक्षा देना ही है। चातुर्मासके नियमों का पालन करने से आत्मानुशासनकी भावना जागृत होती है। खान-पान और आचार-विचार पर नियंत्रण रखने से ही आध्यात्मिक साधना फलीभूत होती है। इससे यह स्पष्ट है कि चातुर्मास सही मायनों में हमें संयम और सदाचार की प्रेरणा देता है।

अभिनव वशिष्ठ.
[https://www.facebook.com/AbhinavJyotisha]

*** आषाढ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) इस वर्ष 30 जून ***


               पद्मपुराण के उत्तरखण्डमें भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं-आषाढ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम हरिशयनी है | यह तिथि महान पुण्यमयी, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली तथा सब पापों को हरनेवाली है | आषाढ शुक्ल एकादशी के दिन कमल पुष्प से कमललोचनभगवान विष्णु का पूजन तथा व्रत करनेवाले को तीनों लोकों का एवं त्रिदेवोंकी पूजा का फल स्वत:प्राप्त हो जाता है | हरिशयनीएकादशी/देवशयनीएकादशी के दिन से श्रीहरिका एक स्वरूप राजा बलि के यहाँ रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शय्यापर तब तक शयन करता है, जब तक आगामी कार्तिक शुक्ल एकादशी (हरि-प्रबोधिनी एकादशी) नहीं आ जाती | आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चातुर्मास में मनुष्य को भलीभांति धर्म का आचरण करना चाहिए | जो प्राणी इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है | इस कारण हरिशयनी एकादशी का व्रत अवश्य करें |

               देवर्षि नारद के पूछने पर महादेव शंकरजी ने इस एकादशी के व्रत के विधान का वर्णन इस प्रकार किया है- आषाढ के शुक्लपक्ष में एकादशी के दिन उपवास करके भक्तिपूर्वक चातुर्मास-व्रत के नियम को ग्रहण करें | श्रीहरिके योग-निद्रा में प्रवृत्त हो जाने पर वैष्णव चार मास तक भूमि पर शयन करें | भगवान विष्णु की शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हुए स्वरूप वाली सौम्य प्रतिमा को पीताम्बर पहिनाएं | तत्पश्चात एक सुंदर पलंग पर स्वच्छ सफेद चादर बिछाकर तथा उस पर एक मुलायम तकिया रखकर शैय्या को तैयार करें | विष्णु-प्रतिमा को दूध, दही, शहद, लावा और शुद्ध घी से नहलाकर श्रीविग्रह पर चंदन का लेप करें | इसके बाद धूप-दीप दिखाकर मनोहर पुष्पों से उस प्रतिमा का श्रृंगार करें |

तदोपरांत निम्नलिखित मंत्र से प्रार्थना करें-
सुप्तेत्वयिजगन्नाथ जगत्सुप्तंभवेदिदम्।
विबुद्धेत्वयिबुध्येतजगत्सर्वचराचरम्॥
हे जगन्नाथ! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सुप्त हो जाता है तथा आपके जागने पर संपूर्ण चराचर जगत् जागृत हो उठता है।

                 श्रीहरिके श्रीविग्रहके समक्ष चातुर्मास-व्रतके नियम ग्रहण करें | स्त्री हो या पुरुष, जो भक्त व्रत करे, वह हरि-प्रबोधिनी एकादशी तक अपनी किसी प्रिय वस्तु का त्याग अवश्य करे | जिस वस्तु का परित्याग करें, उसका दान दें |

" ॐ नमोनारायणाय या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " मंत्र का तुलसी की माला पर जप करें |
भगवान विष्णु का इस प्रकार ध्यान करें-

शान्ताकारंभुजगशयनं पद्मनाभंसुरेशं
विश्वाधारंगगनसदृशं मेघवर्णशुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिध्र्यानगम्यं
वन्दे विष्णुंभवभयहरं सर्वलौकेकनाथम्॥
जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शय्यापर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हैं, नीले मेघ के समान जिनका वर्ण है, जिनके सभी अंग अतिसुंदरहैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो सब लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरणरूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपतिकमलनेत्रभगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूं।

               हरिशयनीएकादशी की रात्रि में जागरण करते हुए हरिनाम-संकीर्तन करें | इस व्रत के प्रभाव से भक्त की सभी मनोकामनाएंपूर्ण होती हैं |
हरिशयनीएकादशी के व्रत को सतयुग में परम प्रतापी राजा मान्धाता ने अपने राज्य में अनावृष्टि से उत्पन्न अकाल की स्थिति को समाप्त करने के लिए किया था | हरिशयनीएकादशी के व्रत का सविधि अनुष्ठान करने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है तथा सुख-समृद्धि का आगमन होता है |

इस वर्ष 30 जून को देवशयनी एकादशी व्रत किया जाना शास्त्रसम्मत है |

अभिनव वशिष्ठ.
[https://www.facebook.com/AbhinavJyotisha]

Tuesday, 19 June 2012

आषाढी गुप्त नवरात्रा (20.06.12 - 28.06.12)



            कालचक्र के विभाग अनुसार एक दिन-रात में चार संधिकाल होते हैं, जिन्हें हम प्रात:, मध्यान्ह, सायं और मध्यरात्रि कहते हैं। इन्हीं को उत्तरायण और दक्षिणायण भी कहा गया है। जिस प्रकार मकर और कर्क वृत से अयन परिवर्तन होता है, उसी प्रकार मेष और तुला से उत्तर तथा दक्षिण गोल परिवर्तन होता है। एक वर्ष में कुल चार संधियां होती हैं। दो अयन परिर्वतन की और दो गोल परिवर्तन की। इनको ही हम नवरात्र पर्व के रूप में मनाते हैं।

           प्रात: काल- गोलसंधि-चैत्र नवरात्र
मध्यान्ह-अयन संधि- आषाढ़ नवरात्र (गुप्त नवरात्र)
सायंकाल- गोल संधि- आश्विन नवरात्र
मध्यरात्रि- अयन संधि- माघ नवरात्र (गुप्त नवरात्र)
आषाढ़ एवं माघ मास में गुप्त नवरात्र होते हैं। अयन संधि के अनुसार आषाढ़ और माघ मास के नवरात्र गुप्त रूप से मनाए जाते हैं। यह समय तांत्रिकों के लिए विशेष साधना का माना गया है। यह पर्व रात्रि प्रधान है। तंत्र शास्त्र में "रात्रि स्पा यतो देवी दिवा स्पो महेश्वर" अर्थात दिन को शिव (पुरूष) स्पा में तथा रात्रि को (शक्ति) रूपा माने गए हैं।

           आदि शक्ति मां दुर्गा का स्वरूप तीव्र और शांत दोनों प्रकार का है। तामसी कार्यो अर्थात शत्रु बाधा, उच्चाटन, मारण, सम्मोहन आदि दोष निवारण के लिए देवी स्वरूप चंद्रिका काली की तथा समस्त मनोकामना की पूर्ति एवं आर्थिक-व्यापारिक उन्नति के लिए मां दुर्गा के शांत स्वरूप की साधना की जाती है। इस वर्ष 20 जून बुधवार आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से गुप्त नवरात्र प्रारंभ हो रहे हैं। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में कू्र ग्रहों से परेशानी हो उनके लिए ग्रहों से संबंधित शांति का यह अच्छा समय है। प्रतिकूल ग्रहों को शांत करने के लिए और मंत्र-यंत्र सिद्धि के लिए गुप्त नवरात्र उत्तम माना गया है |

अभिनव वशिष्ठ.
https://www.facebook.com/AbhinavJyotisha ]

Monday, 11 June 2012

कैसा है आपके घर में ऊर्जा का प्रवाह ?

               किसी भी स्‍थान विशेष का वास्‍तु देखने का मूल अर्थ यह है कि वह स्‍थान किसी व्‍यक्ति अथवा संस्‍था के लिए कितना उपयुक्‍त अथवा अनुपयुक्‍त है। वास्‍तु के नियम भी कमोबेश इसी आधार पर बताए गए हैं। किसी घर में वास्‍तु के अनुरूप निर्माण या वस्‍तुओं को किसी स्‍थान विशेष पर रखना अथवा किसी दफ्तर निर्माण में मूल रूप से अंतर होता है। इसे देवताओं या ऊर्जा, दो आधारों से समझने का प्रयास किया जाता रहा है, अगर देवताओं के आधार पर देखें तो समझना कुछ कठिन प्रतीत होता है, लेकिन अगर इसी वास्‍तु निर्माण को हम ऊर्जा के स्‍तर पर देखें तो आप खुद भी अपने घर के सही वास्‍तु का अनुमान कर सकते हैं।

              वास्‍तु में मूल रूप से तीन बातों का ध्‍यान रखा जाता है। इसमें हवा, पानी और रोशनी शामिल हैं। इन तीनों का बहाव अगर सही हो तो उस घर को वास्‍तु के दृष्टिकोण से उपयुक्‍त कहा जा सकता है। अन्‍य देशों की तुलना में भारत की भौगोलिक स्थिति और मौसम चक्र विशिष्‍ट है। उत्तर की ओर हिमालय, उत्‍तर पश्चिम में रेगिस्‍तान, दक्षिण में समुद्र और पूर्व में पहाडि़यों और समुद्र का मिश्रण। एक ओर हिमालय ठण्‍डे प्रदेशों से आ रही सर्द हवाओं को रोकता है तो अरब की खाड़ी से उठने वाली मानसूनी हवाएं प्रकृति ने केवल भारतीय उपमहाद्वीप के लिए ही बनाई हैं। आप भारत के किसी भी कोने में जाएं इन विशेषताओं का लाभ आपको जरूर मिलेगा।

* आपके घर का वास्‍तु
-------------------------
              घर के वास्‍तु के निर्धारण के समय हमें दिशाओं के ऊर्जा स्‍तर को समझना होगा। वास्‍तु में उत्‍तर और पूर्व दिशा को अधिक ऊर्जा वाली दिशाएं बताया गया है। पूर्व में जहां तेज अधिक है वहीं उत्‍तर में गति अधिक है। उत्‍तर-पूर्व को दोनों का लाभ मिलता है। दक्षिण दिशा में तेजी कम लेकिन दाह यानि गर्मी अधिक है। दक्षिण पूर्व में तेज और दाह दोनों होने से यह शुद्ध स्‍थान बनता है। पश्चिम में रोशनी कम है और गति भी। ऐसे उत्‍तरी पश्चिमी कोना दक्षिणी पश्चिमी कोने की तुलना में अधिक ऊर्जा रखता है, लेकिन उत्‍तरी पूर्वी कोने की तुलना में कम। इसे आप हवा के बहाव, रोशनी के आगमन और जल के प्रवाह के रूप में भी देख सकते हैं।

* उत्‍तर पूर्व बच्‍चों का कोना
------------------------------
               ऊर्जा के इस प्रवाह को समझने के बाद हमें घर में ऊर्जा के प्रवाह के अनुसार ही सदस्‍यों रहने और क्रिया-कलापों के स्‍थान तय करने होंगे। घर का उत्‍तरी पूर्वी कोना अधिकतम ऊर्जा वाला स्‍थान है। यहां उन्‍हीं लोगों को रखा जा सकता है जो इस ऊर्जा के प्रवाह में सहज रह सकें। घर के बच्‍चे इस स्‍थान के लिए सर्वाधिक उपयुक्‍त हैं। पूर्व और उत्‍तर से मिल रही सकारात्‍मक ऊर्जा उन्‍हें तेजी से विकसित करेगी। दक्षिण पूर्व में रसोई बनाने से हमें दक्षिण से मिल रहे दाह और पूर्व से मिल रहे तेज का लाभ होगा। इस स्‍थान पर चूल्‍हा हमेशा जलता रहेगा और स्‍वादिष्‍ट भोजन मिलेगा। दक्षिण पश्चिम में घर के बड़े बुजुर्ग या नियामक सदस्य रह सकते हैं। उनकी गति कम होती है और ऊर्जा का स्‍तर भी। वहां वे सहज रहेंगे। घर के उत्‍तरी पश्चिमी कोने में अधिक सक्रिय सदस्य को रखा जा सकता है, वे ऊर्जा और न्‍यायप्रियता के साथ काम कर सकेंगे, एक और बात जो अनुभवसिद्ध है - विवाह योग्य कन्या को भी यहाँ रखा जा सकता है, चंद्रमा के प्रभाव से सौंदर्य तो बढेगा ही विवाह भी शीघ्र होगा। इसी तरह बिजली के उपकरणों को दक्षिण की दीवार पर और जल से संबंधित वस्‍तुओं को उत्‍तरी क्षेत्र में रखा जाना चाहिए। यह ऊर्जा की प्रकृति के अनुकूल भी होगा।

* ग्रह और उनकी ऊर्जा
-------------------------
               वास्‍तु की संरचना में ग्रहों को वही स्‍थान दिए गए हैं जैसी उनकी ऊर्जा है। यह सकारात्‍मक या नकारात्‍मक हो सकती है। वास्‍तु का पूर्व सूर्य के पास है। यह तेजोमय है। उत्‍तर पूर्व पर गुरु का अधिकार है। यह सकारात्‍मक और तेज है। उत्‍तर पर बुध का अधिकार है। यह रचनात्‍मक और सक्रिय है। उत्‍तर पश्चिम पर चंद्रमा का अधिकार है। यह रचनात्‍मक लेकिन अधिक विचार करने वाला है। पश्चिम पर शनि का अधिकार है। यह नकारात्‍मक और धीमा है। दक्षिण पश्चिम पर राहू का अधिकार है। यह नकारात्‍मक और रहस्‍य समेटे हुए है। दक्षिण पर मंगल का राज है। यह उग्र और दाह देने वाला है। दक्षिण पश्चिम पर शुक्र का राज है। यह उष्‍ण और तेजयुक्‍त है। यह क्षेत्र की ऊर्जा के हिसाब से ही हम उसे काम में लें तो अधिकतम परिणाम हासिल होंगे।

* सामान्‍य उपचार
-------------------
 कुछ सामान्‍य उपचार कर ऊर्जा के स्‍तर को संतुलित रखा जा सकता है -

#सिंह द्वार (घर का मुख्‍य दरवाजे) के आगे किसी प्रकार का अवरोध हो तो उसे हटा देना चाहिए, अथवा सिंह द्वार को वहां से हटा देना चाहिए।
# दक्षिणी कोने में पानी का कम से कम उपयोग करें। वहां दीपक या लाल बल्ब जलाकर रखें।
# उत्‍तरी पश्चिमी कोने में पानी के बहने का साधन बनाए। बर्तन धोने का स्‍थान, वाशिंग मशीन या पेड़ पौधे लगाकर वहां निरंतर पानी गिराया जा सकता है। इससे परिवार में तनाव कम होगा।
# उत्‍तरी और पूर्वी कोनों में दक्षिणी और पश्चिमी कोनों की अपेक्षा अधिक रोशनी का प्रबंध रखें।
# घर में हवा का बहाव सुनिश्चित करने के लिए एक्‍जास्‍ट फैन लगाएं।
# गंदा पानी शुक्र का परिचायक होता है। ऐसे में पूर्व मुखी घरों में घर के दाएं कोने से घर का गंदा पानी निकालने की सलाह दी गई है।
# बाहर से भीतर की ओर शुद्ध जल का प्रवाह उत्‍तरी क्षेत्रों में हो तो बेहतर है।

* चेतना को प्रभावित करता है कचरा
---------------------------------------
               हम घर में मौजूद कचरे के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं। इसके चलते हम इसके निस्‍तारण के बारे में भी गंभीरता से नहीं सोचते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कचरा धीरे-धीरे हमें मानसिक, आर्थिक और कई बार शारीरिक स्‍तर पर भी प्रभावित करने लगता है। वास्‍तु निमयों में कचरे का निस्‍तारण तेजी से करने के लिए कहा गया है। जिस मकान की छत पर कचरा जमा होता है, उस मकान के मालिक पर ऋण तेजी से चढ़ता है, इसी के साथ पैसा भी जगह जगह फंस जाता है। छत पर किसी भी सूरत में कचरे का जमाव नहीं होना चाहिए। यह आर्थिक भार से दबा देता है। कचरा जमा करने का दूसरा सबसे बड़ा स्‍थान है अंडरग्राउंड। जिस मकान के तहखाने में भारी मात्रा में कचरा जमा होता है वहां पारिवारिक तनाव तेजी से बढ़ता है। एक स्थिति यह आती है कि छोटी मोटी बातों पर भी बड़े झगड़े होने लगते हैं। अंडरग्राउंड के कचरे का निस्‍तारण भी तुरत फुरत करना चाहिए। इन दो प्रमुख स्‍थानों के अलावा घर में कई ऐसे कोने होते हैं जहां हमारी इच्‍छा के बगैर कचरा एकत्रित होता रहता है। मसलन कागज के टुकड़े, पुराने बैग, पुराने जूते, पुरानी चिठ्ठियां, मैग्‍जीन, ऐश ट्रे, बच्‍चों के टूटे हुए खिलौने, पुरानी बॉल्‍पेन, धातुओं के टुकड़े, अवधिपार दवाएं, पुराने और टूटे बर्तन, सूखे हुए पौधों जैसी हजारों छोटी छोटी चीजें घर में पड़ी रहती हैं और हम इनकी तरफ ध्‍यान भी नहीं दे पाते हैं। इस कचरे के निस्‍तारण से आप बहुत अधिक राहत महसूस कर सकते हैं। आपको जल्द से जल्द यह काम निपटा देना चाहिए।

आशा करता हूँ आप अपने घर की ऊर्जा को अधिकतम लाभ की स्थिति तक ले जाने का प्रयास अवश्य करेंगे...

अभिनव वशिष्ठ.
[www.facebook.com/AbhinavJyotisha]

Sunday, 10 June 2012

कर्म बड़ा या भाग्‍य ?

               जब से ज्‍योतिष विषय का झण्‍डा उठाया तब से मेरे आस-पास के अधिकांश विचारकों ने यह सवाल हमेशा मेरे सामने खड़ा किया कि क्‍या आवश्‍यकता है ज्‍योतिष की जबकि लॉजिक यह कहता है कि जैसा कर्म करोगे वैसे ही फल मिलेंगे (करम प्रधान बिस्व रचि राखा......) | इसके साथ ही दूसरा सवाल यह कि जब सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो तुम्‍हारा रोल शुरू होने से पहले ही खत्‍म हो जाता है (होई सोई जो राम रचि राखा.....) |

                दोनों की बातें मेरे इस पेशे को खत्‍म कर देने वाली थीं | लेकिन केवल उन्‍हीं लोगों के समक्ष जो कि इन बातों को इसी अंदाज में समझ चुके थे | बाकी लोगों को अब भी लगता है कि उनकी समस्‍याओं का समाधान मेरे पास है | फिर भी एक विद्यार्थी होने के नाते यह सवाल मेरे सामने बड़ी स्‍पष्‍टता से रहा कि कर्म ही हमारी कुण्‍डली है या भाग्‍य पहले से लिखा जा चुका है | अगर भाग्‍य पहले से तय नहीं है तो क्‍या कर्म से कुण्‍डली को बदला जा सकता है |

इसी क्रम में पिछले दिनों फिर एक बार एक पूर्व सहपाठी ने मुझसे यही सवाल दोहराया कि

'Kya Bhagya vaastav mein he karm se bada hota hai aur kya jyotis se bhagya ko badla ja sakta hai.'

इस सवाल का स्‍पष्‍ट जवाब है पता नहीं |

तो मैं यहाँ क्‍या कर रहा हूं ?

इसके जवाब में, मैं यह कह सकता हूं कि जो लोग अपने कर्म से भाग्‍य को बदलने की सोच रहे हैं, मैं उनकी मदद कर रहा हूँ | एक ज्‍योतिषी किसी जातक की क्‍या मदद कर सकता है, इसका बहुत सटीक वर्णन दक्षिण के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी के.एस. कृष्‍णामूर्ति अपनी पुस्‍तक "फंडामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्‍ट्रोलॉजी" में कर चुके हैं | उनके अनुसार नदी में नाव खेते हुए जब एक नाविक किनारा नहीं मिलने पर हारने लगता है तो उसके पास से गुजर रहा एक अन्‍य नाविक उसे बताता है कि आगे इतनी दूरी पर उथला किनारा या जमीन मिल जाएगी | दूसरा नाविक ज्‍योतिषी हो सकता है |

               मुझे भी अधिकांश मामलों में अपना रोल ऐसा ही लगता है | जिसे जो भोगना है वह तो भोगेगा ही, लेकिन यह भोग कब प्रारंभ होगा ? कब खत्‍म होगा ? क्या उपाय किए जा सकते हैं ? या कैसे मुक्ति मिल सकती है ? इस बारे में, मैं संकेत मात्र दे सकता हूँ, एक रास्ता सुझा सकता हूँ, चलना तो उन्हें स्वयं ही पडेगा |

कडे शब्दों में यूँ समझिये...

"न तो किसी और का दुर्भाग्‍य जी सकता हूँ, न ही किसी को मोक्ष दिला सकता हूँ, लेकिन फिर भी जीवन बदल सकता हूँ |"


अभिनव वशिष्ठ.
[www.facebook.com/AbhinavJyotisha]

Saturday, 9 June 2012

प्राणायाम का प्रभाव (शरीर व मन पर)


                कपालभाती और भस्त्रिका प्राणायाम में जिस प्रकार तेजी से सांस लिया और छोड़ा जाता है उससे रक्त, उत्तकों और कोशिकाओं में विद्यमान कार्बनडाईऑक्साइड की मात्रा कम होती है, कोशिकाओं तक पहुँचने वाले ऑक्सीजन में कोई विशेष बढ़ोत्तरी नहीं होती, क्योंकि एक स्वस्थ व्यक्ति में ऑक्सीजन की मात्रा जितनी आवश्यक है उतनी हमेशा सहज श्वांस लेते रहते पर मिल जाती है, सामान्यतः कार्बनडाईऑक्साइड निकल जाने से श्वसन केंद्र उत्तेजित नहीं होते और संभवत: अन्य तंत्रिका केंद्र भी शांत रहते हैं |

               कपालभाती, भस्त्रिका और नाड़ी शोधन प्राणायाम (जिसमें एक मिनट से अधिक सांस नहीं रोकी गई हों) के समय मुख्य शारीरिक परिर्वतन यह होता है कि तेजी से साँस लेने के अंतिम चरण में रक्त में कार्बनडाईऑक्साइड की जो मात्रा रहती है वह धीरे-धीरे बढ़ती हुई सामान्य स्तर से अधिक हो जाती है | एक मिनट के कुम्भक के दौरान कोशिकाएँ, लाल रक्त कण और फेफड़ों में जो ऑक्सीजन जमा रहता है उसे उपयोग में लाती है |

               प्राणायाम का जो सब से व्यापक प्रभाव है उन में प्रमुख है तंत्रिकातंत्र को शांत, संतुलित, तथा निरभ्र करना, उत्तेजना घटना, ताजगी और स्फूर्ति का अनुभव होना तथा चेतना की प्रखरता |

              इन प्रभावों की व्याख्‍या हमारे आधुनिक शरीर विज्ञान के ज्ञात सिद्धातों के द्वारा नहीं हो सकती | प्राणायाम के अभ्यास से जो सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, वह है श्वसन केंद्रों का स्वेच्छा से नियंत्रण | संभवत: इसका प्रभाव मस्तिष्क के अन्य उन्नत केंद्रों पर पड़ता है, जिसकी अंतिम परि‍णति मन और इसकी क्रियाओं पर अधिक नियंत्रण और स्वामित्व के रूप में होती है | रक्त में थोड़ी देर तक कार्बनडाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से उत्प्रेरक की तरह का प्रभाव होता है | इसके कारण कोशिकाओं के अंदर होने वाली रासायनिक क्रियाओं की गति बढ़ जाती है | प्राणायाम कठिन व्यायाम है | जिसका प्रभाव हृदय की गति और रक्तचाप पर भी पड़ता है | प्राणायाम आसनों के अभ्यास से अधिक प्रभावशाली और सुरक्षित है | इसका गहन अभ्यास किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए |

(यह प्रयास श्रीगुरुचरणों में समर्पित, जो स्वयं इसका आधार है)

अभिनव वशिष्ठ.

ஜ۩۞۩ஜ हरि ॐ तत्सत्‌ ஜ۩۞۩ஜ